भारत में यूरोपियों का आगमन

भारत में यूरोपियों का आगमन
भारत में यूरोपियों का आगमन

भारत में यूरोपियों का आगमन

पुर्तगालियों के रूप में भारत में यूरोपियों का आगमन पहली बार हुआ

पुर्तगाली – 1498
डच – 1596
अंग्रेज – 1608
डेनिस – 1616
फ्रेंच – 1664
स्वीडिश – 1771

भारत में यूरोपीय कंपनी की स्थापना

पुर्तगाली ईस्ट इंडिया कंपनी – 1498
अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी – 1600
डच ईस्ट इंडिया कंपनी – 1602
डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी – 1620
फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी – 1664
स्वीडिश ईस्ट इंडिया कंपनी – 1731

यूरोपीय कंपनियों की भारत में पहली कोठी

पुर्तगाली – कोचीन (1503 मे)
अंग्रेज – मसूलीपट्टनम (1611मे)
डच – मसूलीपट्टनम (1605 में)
डेनिश – तंजौर (1616 में)
फ्रेंच – सूरत (1668 में)

भारत में पुर्तगालियों का आगमन

भारत में पुर्तगालियों का आगमन
भारत में पुर्तगालियों का आगमन

वास्को-डि-गामा

  • पुर्तगालियों के रूप में भारत में यूरोपियों का आगमन पहली बार हुआ
  • पहले व्यक्ति थे जो अफ्रीका के ‘केप ऑफ गुड होप’ से होकर यूरोप और भारत के बीच नए समुद्री मार्ग की खोज करते हुए 17 मई 1498 ईस्वी में भारत के पश्चिमी तट पर स्थित कालीकट बंदरगाह पहुंचे।
  • अक्टूबर 1502 ईस्वी में वास्को-डि-गामा व्यापार के उद्देश्य से पुनः कालीकट पहुंचा। इस समय कालीकट में हिंदू शासक ‘जमोरिन’ का शासन था।
  • 1503 ईस्वी में पुर्तगालियों ने कोचीन में अपनी पहली कोठी खोली।
फ्रांसिस्को-द-अलमेडा
  • 1505 ईसवी में पुर्तगालियों ने भारत में अपना प्रथम वायसराय फ्रांसिस्को-द-अलमेडा को बनाया जिसका कार्यकाल 1509 ईसवी तक रहा।
  • अपने कार्यकाल के दौरान अलमेडा सिर्फ युद्ध में व्यस्त रहा फलस्वरूप पुर्तगाल ईस्ट इंडिया कंपनी का ज्यादा विस्तार नहीं हो सका।
  • अपने कार्यकाल के दौरान उसने ‘ब्लू वाटर पॉलिसी’ चलाई थी जिसका उद्देश्य ‘भारतीय तटों पर कब्जा करना’ था।

अलफांसो-द-अल्बूकर्क

  • 1509 ईस्वी में अल्फांसो द अल्बूकर्क को भारत में पुर्तगालियों का दूसरा वायसराय बनाया गया जिसका कार्यकाल 1515 ईस्वी तक रहा।
  • अल्बूकर्क ने 1510 ईसवी में बीजापुर के नवाब युसूफ आदिलशाह से गोवा को जीता।
  • इसने कोचिंग को अपनी राजधानी बनाया।
  • हिंदू महिलाओं से विवाह की नीति अपनाई।भारत के दक्षिण पूर्वी तट पर पुर्तगालियों के लिए एक बस्ती सन थोमे बसाई।
  • मलक्का और कुरमुस (ईरान) पर आधिपत्य स्थापित किया।
  • अतः अल्बूकर्क को भारत में पुर्तगालियों का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।

नीनो-डी-कुन्हा

  • नीनो-डी-कुन्हा भी एक वायसराय था, जिसने कई महत्वपूर्ण कार्य की है। यह 1529 ईस्वी में वायसराय का कार्यभार संभाला।
  • 1535 में दीव को जीता।
  • 1559 में दमन को जीता।
  • गोवा को अपनी राजधानी बनाया।
  • भारत से अंततः पुर्तगाली 1961 में वापस गए।

पुर्तगालियों के पतन का कारण

  • शक्तिशाली राजवंशों का उदय।
  • जेसुइट मिशनरियों की गतिविधियों से उत्पन्न राजनीतिक भय।
  • अन्य शक्तिशाली यूरोपीय शक्तियों का आगमन जैसे अंग्रेज, डच और फ्रांसीसिओं का।
  • समुद्री डकैती।
  • ईसाई धर्म को जबरन थोपना और मुसलमानों का उत्पीड़न।
  • ब्राजील की खोज की चाह।
  • 1580 में पुर्तगाल स्पेन के राजा के साथ जुड़ गया उसके बाद 1588 के नौसेना युद्ध में अंग्रेजों ने स्पेन को करारी शिकस्त दी और स्पेन के साथ-साथ पुर्तगाली साम्राज्य भी लगभग समाप्त हो गया।

भारत में डचों का आगमन

भारत में डचों का आगमन
भारत में डचों का आगमन
  • डच के रूप में भारत में यूरोपियों का आगमन |
  • भारत में डचों का आगमन 1596 ईसवी में भारत के पूर्व सुमात्रा में हो चुका था और पहला डच यात्री कार्नेलियन हाउटमैन था।
  • डच ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना 1602 ईस्वी में हुई।
  • डचों की पहली व्यापारिक कोठी 1605 ईसवी में मसूलीपट्टनम में तथा दूसरी व्यापारिक कोठी पुलीकट में स्थापित की गई।
  • शुरुआत में डच अपनी शक्ति का ज्यादा विस्तार नहीं कर पा रहे थे परंतु, स्पेन के पतन होने के कारण पुर्तगालियों का भी पतन होने लगा जिससे डच को अपनी वाणिज्यिक और नौसैनिक शक्ति को बढ़ाने में काफी बल मिला।
  • भारत के पूर्वी एवं पश्चिमी तटों पर डचों अपनी फैक्ट्रियां स्थापित करना शुरू कर दी – 1605 में मसूलीपट्टनम में, 1610 में पुलिकट में, 1616 में सूरत में, 1641 में बिमिलिपट्टम में, 1645 में करिकल में, 1653 में चिन्सुरा में, 1658 में कासिमबाजार, पटना, बालासोर, व नेगापट्टम में तथा 1663 में कोचिंन में डचों ने अपनी फैक्ट्रियां स्थापित की।
  • इसके अलावा डचों ने पुर्तगालियों के व्यापारिक सत्ता को तोड़ने के लिए एक व्यापारिक संस्था
  • वोक (VOC) बनाई जिससे पुर्तगालियों की व्यापारिक सत्ता तोड़ने में और अपनी व्यापारिक सत्ता जमाने में काफी मदद मिली।
  • 17 वीं शताब्दी के दौरान डच ने पुर्तगालियों के प्रभाव को लगभग समाप्त करके मसाले के व्यापार पर अपना एकाधिकार सुनिश्चित कर लिया। इसके अलावे अन्य व्यापारों में भी अपना प्रभुत्व स्थापित करने लगे। ऐसे में अब मुख्य रूप से इनका एक ही प्रतिद्वंदी बचा और वह थे अंग्रेज। अतः डच और अंग्रेजो के बीच संघर्ष शुरू हो गया। डच और अंग्रेजो के बीच यूरोप में 3 आंग्ल-डच युद्ध हुए जिनमें अंग्रेजों की विजय हुई। 1717 में अंग्रेजों को मुगलों द्वारा व्यापार करने हेतु शाही फरमान मिला इससे अंग्रेजों की व्यापारिक शक्ति में वृद्धि होने लगी तथा बच्चों की व्यापारिक शक्ति कमजोर होने लगी।
  • अंततः 1759 में बेदरा का युद्ध हुआ जिसमें अंग्रेजों की विजय हुई और डच बुरी तरह से पराजित हुए और इस तरह भारत में उनकी महत्वाकांक्षाओं का अंत हुआ।

डचों के पतन का कारण

  • अंग्रेजों की तरह डच कंपनी के अधिकारियों एवं कर्मचारियों में कंपनी के प्रति निष्ठा, कुशल नेतृत्व एवं उत्साह की भावना का अभाव था।
  • डच राष्ट्र (हाॅलैंड) लंबे समय तक पराधीन रहा था अतः उसके पास साधनों की कमी थी जबकि दूसरी ओर इंग्लैंड सदा स्वाधीन रहा था और उसके पास साधनों की प्रचुरता थी।
  • बाद के वर्षों में डच व्यापारियों ने भारत की अपेक्षा दक्षिण पूर्वी एशिया के मसालों के दीपों की ओर अपना ध्यान केंद्रित किया।
  • यूरोप में अंग्रेजों तथा फ्रांस ईश्वर से युद्ध करके अपनी स्थिति को देने तथा समुद्र पर अधिकार खो देने के पश्चात उनकी शक्ति में भारी कमी आ गई।

भारत में अंग्रेजों का आगमन

भारत में अंग्रेजों का आगमन
भारत में अंग्रेजों का आगमन
  • अंग्रेजों के रूप में भारत में यूरोपियों का आगमन |
  • अन्य यूरोपीय देशों की देखा देखी अंग्रेज भी पूर्वी व्यापार से काफी प्रभावित हुए। 1599 ईस्वी में अंग्रेज व्यापारी ‘मिल्डेनहॉल’ भारत आया था जिसे देख कर अंग्रेजों को भारत में व्यापार करने के मनोबल में और वृद्धि हुई।
  • 31 दिसंबर 1600 ईस्वी को ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ प्रथम के एक चार्टर के द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई जिसमें 217 सदस्य थे और जिसके प्रथम गवर्नर टॉमस इसमें थे। इसका उद्देश्य भारत में व्यापार करना एवं लाभ कमाना था।
  • आधिकारिक रूप से पहली बार 24 अगस्त 1608 इसवी को ‘रेड ड्रैगन’ नामक जहाज से व्यापार के उद्देश्य से अंग्रेजों का सूरत बंदरगाह में आगमन हुआ।
  • भारत आने के पश्चात 1608 ईसवी में अंग्रेजों द्वारा सूरत में पहली कोठी स्थापित करने का प्रयास किया गया। इस हेतु पहली बार 1609 ईसवी में कैप्टन हॉकिंस को जेम्स प्रथम के राजदूत के रूप मेंमुगल बादशाह जहांगीर के दरबार में भेजा गया परंतु पुर्तगालियों के षड्यंत्र के कारण उसे खाली हाथ लौटना पड़ा। अतः सूरत में पहली कोठी बनाने का प्रयास स्थगित रह गया।
  • इसके पश्चात 1611 ईस्वी में अंग्रेजों ने मसूलीपट्टनम में अपनी पहली कोठी स्थापित कर दी।
  • 1611 ईस्वी में ही कैप्टन मिड्डलेटन ने सूरत के निकट स्वाली हॉल में पुर्तगालियों के जहाजी बेड़ों को परास्त किया जिससे मुगल सम्राट जहांगीर प्रभावित होकर 1613 ईस्वी में सूरत में स्थाई कारखाना स्थापित करने की अनुमति प्रदान कर दी अत: 1613 ईस्वी में सूरत में भी अंग्रेजों की कोठी स्थापित हो गई।
  • 1615 में जेम्स प्रथम का दूसरा राजदूत सर टॉमस रो जहांगीर के दरबार में गया और विभिन्न स्थानों पर कारखाने स्थापित करने का विशेषाधिकार प्राप्त करने में सफल रहा।
  • 1622 ईस्वी में अंग्रेजों ने ओर्मुजपुर पर कब्जा किया और पुर्तगालियों के आक्रमण से सुरक्षित हो गए।
  • 1623 ईस्वी तक भड़ोंच और अहमदाबाद में भी कारखाने स्थापित किए गए और उनकी सुरक्षा हेतु किलेबंदी भी की गई।
  • 1625 ईस्वी में सूरत की किलेबंदी की गई।
  • 1632 इस्वी में अंग्रेजों को 500 पैगोडा/वर्ष किराए के दर से गोलकुंडा में व्यापार करने का सुनहला फरमान मिला।
  • 1633 में उड़ीसा के बालासोर में कारखाना स्थापित किया गया।
  • 1639 ईस्वी में अंग्रेजों ने स्थानीय राजा से मद्रास लीज पर लिया और उसकी किलेबंदी कर दी। 1640 ईस्वी में अंग्रेजों ने चंद्रगिरी के राजा से मद्रास छीन लिया और यहां पर ‘सेंट जॉर्ज’ किले का निर्माण किया जिसके अंदर कारखाने खोले गए।‌
  • 1651 में बंगाल के हुगली में कारखाना स्थापित किया गया।
  • 1658 ईस्वी में बंगाल, बिहार, उड़ीसा और कोरोमंडल तट ‘सेंट जॉर्ज’ किले के नियंत्रण में आ गए।
  • 1951, 1956 और 1972 के फरमानों के तहत अंग्रेजों को कई तरह की चुंगी और सीमा शुल्क से मुक्ति मिली। इसके बदले वे भारतीय राजाओं को कुछ निश्चित राशि अदा करने लगे।
  • 1661 ईस्वी में ब्रिटेन के राजकुमार ‘चार्ल्स द्वितीय’ का विवाह पुर्तगाली राजकुमारी ‘कैथरीन ऑफ ब्रिगेन्जा’ के साथ हुआ। इसमें पुर्तगालियों ने मुंबई को दहेज के रूप में चार्ल्स द्वितीय को दे दिया। और चार्ल्स द्वितीय ने इसे ईस्ट इंडिया कंपनी को 10 पौंड वार्षिक किराए पर दे दिया।
  • 1680 में मुगल सम्राट ने कंपनी को सीमा शुल्क रहित व्यापार करने की अनुमति दे दी।
  • 1687 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी का मुख्यालय सूरत से बदलकर मुंबई किया गया।
  • ‘गेराल्ड औंगियर’ ने मुंबई शहर की स्थापना की।
  • 1691 ईस्वी में औरंगजेब के एक फरमान द्वारा अंग्रेजों को एक निश्चित वार्षिक राशि के बदले चुंगी रहित व्यापार करने की अनुमति मिल गई। अतः उन्होंने शीघ्र ही सुता नदी में एक कारखाना स्थापित कर लिया और उसकी किलेबंदी कर दी।
  • 1698 इस्वी में कंपनी ने 1200 रु में सुतानती, गोविंदपुर और कलिकता गांव की राजस्व वसूलने का अधिकार प्राप्त कर लिया।
  • ‘जाॅर्ज चारनोक’ ने कोलकाता में ‘फोर्ट विलियम’ का स्थापना करवाया।
  • 1707 ईस्वी में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात मुगल साम्राज्य कमजोर हो गया जिससे अंग्रेजों को अपनी शक्ति का विस्तार करने में काफी मदद मिली।
  • 1717 ईस्वी में मुगल सम्राट फर्रूखसियर ने ‘शाही फरमान’ जारी किया जिसने अंग्रेजो को निम्नलिखित विशेषाधिकार दे दिए
  • ईस्ट इंडिया कंपनी को कोलकाता के आस पास के और अधिक क्षेत्रों में राजस्व वसूली के अधिकार प्रदान किए गए।
  • 10000 सालाना राशि देने के एवज में सूरत के सभी करों से उन्हें मुक्ति मिल गई।
  • 30000 सालाना राशि देने के एवज में कंपनी को बिना शुल्क दिए बंगाल में मुक्त रूप से व्यापार करने की छूट मिली।
  • मुंबई में ढाले गए कंपनी के सिक्के को पूरे मुगल साम्राज्य में वैधता प्रदान करने की भी घोषणा की गई।
    1757 ईस्वी में रॉबर्ट क्लाइव (अंग्रेज) और बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के बीच प्लासी का युद्ध हुआ जिसमें अंग्रेज विजयी हुए इसके पश्चात बंगाल में अंग्रेजों का प्रभुत्व जम गया।
    1764 ईस्वी में हेक्टर मुनरो (अंग्रेज) और बंगाल के नवाब मीर कासिम, अवध के नवाब सुजाउद्दौला और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय के बीच बक्सर का युद्ध हुआ जिसमें अंग्रेज विजयी रहे।

अंग्रेजों ने पुर्तगालियों को रास्ते से कैसे हटाया

  • 1630 में अंग्रेजों और पुर्तगालियों के बीच मैड्रिड की संधि हुई जिससे उन दोनों के मध्य की दुश्मनी समाप्त हुई।
  • 1634 ईस्वी में अंग्रेजों और पुर्तगालियों के बीच दूसरी संधि हुई जिसके तहत भारत के व्यापारिक एवं वाणिज्यिक मामलों में दोनों एक दूसरे की मदद करेंगे।
  • 1654 ईस्वी में पुर्तगालियों ने पूर्व के व्यापार पर अंग्रेजों के अधिकार को स्वीकार कर लिया।
  • 1661 ईस्वी में ब्रिटेन के राजकुमार ‘चार्ल्स द्वितीय’ का विवाह पुर्तगाली राजकुमारी ‘कैथरीन ऑफ ब्रिगेन्जा’ के साथ हुआ। इसमें पुर्तगालियों ने मुंबई को दहेज के रूप में चार्ल्स द्वितीय को दे दिया। इस प्रकार विवाह की नीति के तहत दोनों ने आपस में संधि करके भारत के डचों के विरुद्ध दोनों एकजुट हो गए।

अंग्रेजों ने डचों को रास्ते से कैसे हटाया

  • डच भारत में मसालों के व्यापार में संपन्न थे, परंतु दक्षिण पूर्व एशिया में भी मसालों के व्यापार की ओर ज्यादा आकर्षण होने के कारण भारत के व्यापार से पकड़ ढीली हो रही थी।
  • 1667 ईस्वी में डच भारत में स्थापित अंग्रेजी अड्डों को छोड़ने के लिए राजी हो गए और अंग्रेजों ने इंडोनेशिया पर अपना दबाव छोड़ दिया। इस प्रकार दोनों शक्तियों ने पारस्परिक समझौता कर लिया।
  • 18वीं शताब्दी में डचों का तेजी से पतन होने लगा और अंततः 1795 ईस्वी में अंग्रेजों ने डचों को भारत से बाहर निकालने में सफल रहे।

भारत में फ्रांसीसियों का आगमन

भारत में  फ्रांसीसियों  का आगमन
भारत में फ्रांसीसियों का आगमन
  • फ्रांसीसियों के रूप में भारत में यूरोपियों का आगमन
  • अन्य यूरोपियों की भांति ही फ्रांसीसी भी पूर्वी व्यापार के तरफ आकर्षित होने लगे। अतः 1664 ईस्वी में फ्रांसीसी राजा ‘लुई चौदहवें’ के एक मंत्री ‘काॅल्बर्ट’ द्वारा फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की गई।
  • 1667 ईस्वी में ‘फ्रांसिस केरोन’ की अध्यक्षता में फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी भारत आई।
  • 1668 ईस्वी में फ्रांसीसियों द्वारा ‘सूरत’ मे अपनी पहली कोठी स्थापित की गई।
  • 1669 ईस्वी में इन्होंने अपनी दूसरी कोठी ‘मसूलीपट्टनम’ में स्थापित की।
  • फ्रांसिस मार्टिन को सूरत और मसूलीपट्टनम का उत्तरदायित्व सौंपा गया।
  • 1672 में फ्रांसीसिओं ने गोलकुंडा के सुल्तान से सैनथोम जीत लिया।
  • 1673 ईस्वी में फ्रैंको मार्टिन ने पांडिचेरी की स्थापना की।
  • 1690 ईस्वी में फ्रांसीसियों ने मुगलों से चंद्रनगर प्राप्त की।
  • 1725 में मालाबार तट और 1739 में करीकल पर फ्रांसिसियों ने अपना कब्जा जमाया, इसके बावजूद भी फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी डचों और अंग्रेजों की तुलना में काफी पिछड़ी हुई थी क्योंकि ये अपनी सरकार पर अधिक निर्भर थी। 1742 ईस्वी में जब डुप्ले फ्रांसीसी गवर्नर के रूप में नियुक्त हुआ
  • तब फ्रांसीसियों की स्थिति में सुधार आने की संभावना नजर आई, परंतु यह भी क्षणिक था।

अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच संघर्ष

प्रथम कर्नाटक युद्ध

प्रथम कर्नाटक युद्ध
प्रथम कर्नाटक युद्ध
  • यह युद्ध 1746 से 1748 तक चला।
  • इस युद्ध के मुख्य रूप से दो कारण थे – पहला कर्नाटक के नवाब पद के उत्तराधिकार के लिए और दूसरा ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार के लिए युद्ध जिसका प्रभाव भारत में अंग्रेजों एवं फ्रांसीसियों पर पड़ा। इसी दौरान डूप्ले ने मद्रास पर अधिकार कर लिया फलस्वरूप सेंट थॉमस का युद्ध हुआ तथा मद्रास वापस अंग्रेजों को दे दिया गया।
  • प्रथम कर्नाटक युद्ध 1748 ईस्वी में यूरोप में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच ‘ए-ला-शापेल’ की संधि के साथ समाप्त हो गया। इस संधि के तहत अंग्रेजों को भारत में मद्रास तथा फ्रांसीसियों को उतरी अमेरिका में लुईसबर्ग वापस मिल गया।
  • इस युद्ध से न तो फ्रांसीसियों को लाभ हुआ और न ही अंग्रेजों को। परंतु इस युद्ध से भारतीय राजाओं की कमजोरियां उजागर हुई जिसने फ्रांसीसियों और अंग्रेजों के साम्राज्य विस्तार की महत्वाकांक्षा को बढ़ा दिया।

द्वितीय कर्नाटक युद्ध

 द्वितीय कर्नाटक युद्ध
द्वितीय कर्नाटक युद्ध
  • यह युद्ध 1949 से 1954 तक चला।
  • इस युद्ध का प्रमुख कारण हैदराबाद और कर्नाटक का उत्तराधिकार युद्ध था।
  • दरअसल 1948 में हैदराबाद के निजाम आसफजाह निजामुल्मुल्क की मृत्यु के पश्चात उसके पुत्र मुजफ्फरजंग तथा नासिरजंग के बीच उत्तराधिकार के लिए युद्ध छिड़ गया ठीक उसी समय कर्नाटक में भी कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन तथा भूतपूर्व नवाब दोस्त अली के दामाद चंदा साहब के बीच भी उत्तराधिकार का युद्ध छिड़ गया।
  • ऐसे में अंग्रेजों ने हैदराबाद में नासिरजंग तथा कर्नाटक में अनवरुद्दीन का साथ दिया, जबकि फ्रांसीसियों ने हैदराबाद में मुजफ्फरजंग एवं कर्नाटक में चंदा साहब का साथ दिया।
  • इस कारण फिर से अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच युद्ध छिड़ गया।
  • फ्रांसीसी गवर्नर डूप्ले की सहायता से कर्नाटक पर चंदा साहब का अधिकार हो गया तथा डुप्ले की ही कूटनीति और चतुराई से हैदराबाद पर मुजफ्फरजंग का अधिकार हो गया।
  • ऐसे में अंग्रेज गवर्नर रॉबर्ट क्लाइव ने चतुराई दिखाते हुए तंजौर और मैसूर के शासक तथा मराठों को अपने पक्ष में कर लिया, तथा कर्नाटक की राजधानी अर्काट पर आक्रमण कर अर्काट को अपने अधिकार में ले लिया। इसके पश्चात अंग्रेजों ने त्रिचनापल्ली पर कब्जा कर लिया। इस परिस्थिति से निपटने के लिए डूप्ले ने कूटनीति के साथ मैसूर के शासक तथा मराठों को अपने पक्ष में कर लिया तथा पुण: त्रिचनापल्ली पर घेरा डाल दिया।
  • इस पूरे युद्ध के दौरान फ्रांसीसियों का पक्ष डूप्ले के नेतृत्व में काफी मजबूत रहा परंतु इसी दौरान डुप्ले को फ्रांस वापस बुला लिया जाता है तथा भारत में गुडेहू को नया गवर्नर नियुक्त कर दिया जाता है।
  • अंततः यह युद्ध 1755 में पांडिचेरी की संधि के साथ समाप्त हो जाता है जिसमें यह प्रावधान किया जाता है कि भारतीय राज्यों के आंतरिक मामलों में दोनों शक्तियां हस्तक्षेप नहीं करेंगी और साथ ही साथ अंग्रेजों और फ्रांसीसियों ने एक दूसरे के विजित प्रदेशों को वापस कर दिया। इस तरह डुप्ले के द्वारा की गई सारी मेहनत बेकार हो गई और अंग्रेजों के लिए भारत में आगे का रास्ता प्रशस्त हुआ।

तृतीय कर्नाटक युद्ध

 तृतीय कर्नाटक युद्ध
तृतीय कर्नाटक युद्ध
  • यह युद्ध 1756 से 1763 तक चला।
  • इस युद्ध का प्रमुख कारण यूरोप में शुरू हुई सप्तवर्षीय युद्ध थी जिसका सीधा प्रभाव भारत में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच पड़ा। परंतु 1757 की प्लासी की लड़ाई के बाद अंग्रेज अब बहुत मजबूत हो चुके थे बंगाल और चंद्रनगर तथा कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अंग्रेजों का आधिपत्य स्थापित हो चुका था। ऐसे में फ्रांसीसी सरकार ने अप्रैल 1758 ईस्वी में सेनापति काउंट डी लाली को एक विशाल सेना के साथ भारत भेजा। लाली ने अपनी तरफ से प्रयास तो बहुत किया परंतु इसका कुछ खास परिणाम नहीं निकला। अंततः 1760 ईस्वी में फ्रांसीसियों और अंग्रेजों के बीच एक निर्णायक युद्ध हुई जिसमें फ्रांसीसी सेना का नेतृत्व काउंट डी लाली तथा अंग्रेजी सेना का नेतृत्व सर आयरकूट कर रहे थे।इस युद्ध में अंग्रेजों ने फ्रांसीसियों को बुरी तरह पराजित किया।
  • इसके बाद 1763 में यूरोप में फ्रांसीसियों एवं अंग्रेजो के बीच पेरिस की संधि हुई जिसके तहत अंग्रेजों ने फ्रांसीसियों को पांडिचेरी तथा चंद्रनगर आदि प्रदेश लौटा दिए परंतु साथ ही साथ यह भी शर्त रखी की फ्रांसीसी अब भारत में सेना नहीं रख सकेंगे। इस तरह से भारत में फ्रांसीसियों का साम्राज्य विस्तार का सपना अधूरा रह गया और अंग्रेजों ने साम्राज्य विस्तार कर भारत पर अपना शासन स्थापित किया।

भारत में फ्रांसीसियों के असफलता का कारण

  • फ्रांसीसी सरकार द्वारा उचित सहयोग की कमी।
  • फ्रांसीसी जल सेना का अंग्रेजों की तुलना में कमजोर होना।सेना
  • फ्रांसीसी काफी बाद में आए थे अतः उनकी कंपनी ज्यादा सुदृढ़ नहीं हो पाई थी।
  • फ्रांसीसियों की सेना अंग्रेजों की तुलना में कम थी।
  • फ्रांसीसी सेना में कुशल नेतृत्व का अभाव था।
  • फ्रांसीसी सेना में अपनी कंपनी के प्रति लगन एवं निष्ठा की कमी थी।
  • फ्रांसीसी सरकार द्वारा डुप्ले को वापस बुलाना।
  • अंग्रेजों द्वारा बंगाल विजय जो एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था।
  • काउंट डी लाली का अकुशल नेतृत्व।
  • यूरोप का आंग्ल-फ्रांसीसी युद्ध जिसमें फ्रांस बुरी तरह उलझा रहा।

भारत में अंग्रेजों के सफलता का कारण

  • अंग्रेजी सरकार द्वारा कंपनी को पूर्ण सहयोग करना।
  • अंग्रेजों के पास मजबूत जल सेना का होना।
  • अंग्रेजी कंपनी के सेना एवं अधिकारियों का अपनी कंपनी के प्रति पूर्ण लगन एवं निष्ठा होना।
  • अंग्रेजी सेना में कुशल नेतृत्वकर्ता का होना।
  • बंगाल विजय जो व्यापारिक एवं आर्थिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण केंद्र था।

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