न्यायिक समीक्षा

न्यायिक समीक्षा

न्यायिक समीक्षा क्या है?

न्यायिक समीक्षा की शुरुआत

  • अमेरिका के उच्चतम न्यायालय में सन् 1803 में मारबरी बनाम मेडिसन मामले में मुख्य न्यायाधीश जॉन मार्शल के द्वारा न्यायिक समीक्षा की शुरुआत की गई थी।

न्यायिक समीक्षा क्या है?

  • विधायिका द्वारा बनाए गए अधिनियमों या कार्यपालिका द्वारा दिए गए आदेशों की जांच करके यह बताना की ये किस हद तक संवैधानिक है, न्यायिक समीक्षा कहलाता है। यह शक्ति न्यायपालिका के पास है। इस जांच में संविधान का उल्लंघन पाए जाने पर उन्हें अवैध घोषित किया जा सकता है अत: सरकार उन्हें लागू नहीं कर सकती। न्यायपालिका की इस शक्ति का न तो संशोधन किया जा सकता है और न ही किसी प्रकार की इसमे कटौती की जा सकती है।

न्यायिक समीक्षा का वर्गीकरण

  1. संविधान संशोधन की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।
  2. संघ तथा राज्य एवं राज्यों के अधीन अधिकारियों द्वारा प्रशासनिक कार्यवाहियों की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।
  3. संसद और विधायिका द्वारा पारित अधीनस्थ कानूनों की समीक्षा की जा सकती है।

न्यायिक समीक्षा का उदाहरण

  • गोलकनाथ मामला 1967
  • बैंक राष्ट्रीयकरण मामला 1970
  • केशवानंद भारती मामला 1973
  • मिनर्वा मिल्स मामला 1980
  • राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग मामला 2015

न्यायिक समीक्षा का महत्व

  • यह मूल अधिकारों की रक्षा करता है।
  • यह संघीय संतुलन बनाए रखने में सहायता करता है।
  • यह संविधान की सर्वोच्चता को बनाए रखता है।

न्यायिक समीक्षा के लिए संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद 13 घोषणा करता है कि सभी कानून जो मूल अधिकारों के संगति में रहे हैं या उनका अपकर्ष करते हैं निरस्त माने जाएंगे।
  • अनुच्छेद 32 संवैधानिक उपचारों का अधिकार (5 रिट)।
  • अनुच्छेद 131 केंद्र राज्य तथा अंतर राज्य विवादों की समीक्षा।
  • अनुच्छेद 132 संवैधानिक मामलों में सर्वोच्च न्यायालय अपीलीय क्षेत्राधिकार सुनिश्चित करता है।
  • अनुच्छेद 133 सिविल मामलों में सर्वोच्च न्यायालय अपीलीय क्षेत्राधिकार सुनिश्चित करता है। • अनुच्छेद 134 अपराधिक मामलों में सर्वोच्च न्यायालय अपीलीय क्षेत्राधिकार सुरक्षित सुनिश्चित करता है।
  • अनुच्छेद 134 (a) उच्च न्यायालय से सर्वोच्च न्यायालय को अपील करने के लिए प्रमाण पत्र से संबंधित है।
  • अनुच्छेद 135 सर्वोच्च न्यायालय को पूर्व के कानूनों के अंतर्गत न्यायिक समीक्षा का अधिकार है।
  • अनुच्छेद 136 सर्वोच्च न्यायालय किसी भी न्यायाधिकरण को अवकाश की अनुमति दे सकता है।
  • अनुच्छेद 143 राष्ट्रपति को सलाह देता है (मांगने पर)।
  • अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालय को रिट जारी करने की शक्ति प्रदान करता है।
  • अनुच्छेद 227 सर्वोच्च न्यायालय सभी उच्च न्यायालय को उनके न्याय क्षेत्र में आने वाले सभी न्यायाधिकरण को अधीक्षण की शक्ति प्रदान करता है (सैन्य न्यायाधिकरण को छोड़कर)।
  • अनुच्छेद 245 संसद एवं राज्य विधायिका द्वारा निर्मित कानूनों की क्षेत्रीय सीमा तय करने की शक्ति।
  • अनुच्छेद 246 संसद एवं राज्य विधायिका द्वारा संघ सूची, राज्यसूची एवं समवर्ती सूची से संबंधित विषय।
  • अनुच्छेद (251+254) केंद्र और राज्य के कानूनों के टकराव की स्थिति में केंद्रीय कानून ऊपर रहेगा।
  • अनुच्छेद 372 संविधान पूर्व के कानूनों की निरंतरता से संबंधित है।

नवीं अनुसूची की न्यायिक समीक्षा

  • अनुच्छेद 31(b) नवीं अनुसूची में शामिल अधिनियमों एवं विनियमों के कारण यदि किसी भी मौलिक अधिकार का उल्लंघन होता है तो नवी अनुसूची पर भी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।
  • अनुच्छेद 31(b) को संविधान संशोधन अधिनियम 1951 के तहत जोड़ा गया है।

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