न्यायिक सक्रियता

न्यायिक सक्रियता

 

न्यायिक सक्रियता क्या है?

न्यायिक सक्रियता की अवधारणा न्यायिक सक्रियता का प्रादुर्भाव सर्वप्रथम 1947 में ऑर्थर सेलसिंगर जूनियर द्वारा अमेरिका में हुई। भारत में इसका प्रादुर्भाव 1970 के दशक में हुआ।

न्यायिक सक्रियता क्या है?

  • न्यायिक सक्रियता नागरिकों के अधिकारों को संरक्षण प्रदान करने के लिए तथा समाज में न्याय को बढ़ावा देने के लिए विधायिका एवं कार्यपालिका को बाध्य करता है। यह नागरिकों को हर परिस्थिति में न्याय दिलाने का काम करता है।

न्यायिक सक्रियता को बल देने वाले कारक

  1. निर्धनता अधिकार समूह  – ये समूह गरीबों के मामलों को न्यायालय के समक्ष लाते हैं तथा यथासंभव उन्हें न्याय भी दिलाते हैं।
  2. वर्गीकृत वैयक्तिक आवेदक याचिकाकर्ता – यह कुछ वकीलों का समूह होता है जो महत्वपूर्ण मुद्दों को सामने लाते हैं। 
  3. महिला अधिकार समूह – ये समूह महिलाओं के अधिकारों के लिए तथा उन्हें हिंसा, उत्पीड़न एवं बलात्कार जैसे मामलों में सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आंदोलन करते हैं।
  4. मीडिया स्वायत्तता समूह  – ये समूह सरकार तथा सरकारी तंत्रों को जवाबदेह बनाते हैं।
  5. नागरिक अधिकार कार्यकर्ता – ये समूह नागरिकों के अधिकारों से जुड़े मामले उठाते हैं।
  6. बाल अधिकार समूह – ये समूह बच्चों के अधिकारों से संबंधित मामलों को उठाते हैं।
  7. हिरासती या परिरक्षण अधिकार संबंधी समूह – ये समूह कैदियों तथा निवारक बंदियों के लिए सामाजिक कार्यवाहियां करते हैं।
  8. मूलवासी जन अधिकार समूह  – ये समूह वनवासियों, संविधान की पांचवी एवं छठी अनुसूचियों के नागरिकों के अधिकारों के लिए कार्य करते हैं।
  9. वर्गीकृत अधिवक्ता आधारित समूह  – यह प्रभावशाली वकीलों का समूह है जो विभिन्न मुद्दों के लिए आंदोलन करते हैं।
  10. बार आधारित समूह – ये समूह भारतीय न्यायपालिका की स्वायत्तता तथा जवाबदेही संबंधी मुद्दों के लिए आंदोलन करते हैं।
  11. बंधुआ मजदूर समूह  – ये समूह भारत में मजदूरी दास्तां के उन्मूलन के लिए न्यायिक सक्रियता की अपेक्षा करते हैं।
  12. वृहद सिंचाई परियोजनाओं के विरुद्ध नागरिक समूह  – ये समूह वृहद सिंचाई परियोजनाओं को रोकने के लिए न्यायपालिका को बाध्य करते हैं जो कि दुनिया के किसी भी न्यायपालिका के लिए असंभव है।
  13. जन अधिकार कार्यकर्ता  – ये समूह सामाजिक एवं आर्थिक अधिकारों पर जनांदोलनों का राज्य द्वारा दमन की स्थिति में जोर देते हैं।
  14. उपभोक्ता अधिकार कार्यकर्ता – ये समूह राजनीति एवं आर्थिक व्यवस्था की जवाबदेही के ढांचे में उपभोक्ता अधिकार संबंधी मामले उठाते हैं।
  15. पर्यावरणीय कार्यवाही समूह – ये समूह न्यायिक सक्रियता को बढ़ते पर्यावरणीय गिरावट तथा प्रदूषण को समाप्त करने के लिए उत्प्रेरित करते हैं।

न्यायिक सक्रियता से उत्पन्न होने वाली समस्याएं

  1. लोकतंत्र संबंधी भय – जनहित याचिका वास्तव में लोकतंत्र का पोषण कर रही है या भविष्य की इसकी संभावनाओं को समाप्त कर रही है? 
  2. प्रबंध संबंधी भय – भारतीय न्यायालय के पास कार्यभार का पहले से ही बहुत ज्यादा बोझ है ऐसे में न्यायिक सक्रियता इस के बोझ को और बढ़ा सकती है।
  3. मीमांसात्मक भय  – न्यायिक सक्रियता में शामिल लोग क्या वास्तव में अपने अपने क्षेत्र में विशेषज्ञ होते हैं|
  4. विचारात्मक  – क्या वे विधायिका कार्यपालिका या नागरिक समाज की अन्य स्वायत्त संस्थाओं की शक्ति हड़प रहे हैं।
  5. वैधता संबंधी भय – न्यायपालिका से लोगों का भरोसा कम हो सकता है।
  6. आत्मवृत्ति संबंधी भय – सेवानिवृत्ति के पश्चात राष्ट्रीय मामलों में मेरा क्या स्थान होगा अगर मैं इस प्रकार के वाद आवश्यकता से अधिक करूं।

न्यायिक सक्रियता बनाम न्यायिक संयम 
न्यायिक संयम का अर्थ 

  • न्यायिक संयम से आशय यह है कि न्यायाधीश की भूमिका सीमित होनी चाहिए, उनका काम इतना भर बताना है कि कानून क्या है? कानून बनाने का काम विधायिका एवं कार्यपालिका पर ही छोड़ देना चाहिए। न्यायाधीशों को किसी भी स्थिति में अपनी निजी राजनीतिक मूल्यों एवं नीतिगत एजेंडा को अपने न्यायिक विचार पर हावी नहीं होने देना चाहिए।

न्यायिक संयम की पूर्वधारणा 

  • यह एक अलोकतांत्रिक तंत्र है क्योंकि यह अनिर्वाचित है अत: यह लोगों के प्रति उत्तरदाई नहीं है। 

सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी 

  • 2007 में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाते हुए न्यायिक संयम की बात की और न्यायालयों से कहा कि विधायिका एवं कार्यपालिका के काम को अपने हाथ में ना लें।

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