उच्चतम न्यायालय

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उच्चतम न्यायालय

भारत में उच्चतम न्यायालय का इतिहास 

  • भारत में पहली उच्चतम न्यायालय की स्थापना 1774 में कोलकाता में 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट के तहत हुई। इसमें 1 मुख्य न्यायाधीश (एलिजाह इम्पे) और 3 अन्य न्यायाधीशों को नियुक्त किया गया।
  • इसके बाद भारत में पहली संघीय न्यायालय की स्थापना 1 अक्टूबर 1937 में भारत शासन अधिनियम 1935 के तहत हुआ जो भारत में सर्वोच्च तो था परंतु इससे भी सर्वोच्च प्रीवी काउंसिल (लंदन) को रखा गया।
  • भारत में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना जनवरी 1950 में हुई, जिसके पहले मुख्य न्यायाधीश संघीय न्यायालय के अंतिम न्यायाधीश (हरिलाल जे कानिया) को बनाया गया।
  • उच्चतम न्यायालय का ध्येय वाक्य – “यतो धर्मस्ततो जय:” अर्थात जहां धर्म है वहां विजय है।
  • वर्तमान में (18 नवंबर 2019 से) भारत के मुख्य न्यायाधीश ‘शरद अरविंद बोबड़े‘ हैं, जो भारत के 47 वें मुख्य न्यायाधीश हैं।

भारत में उच्चतम न्यायालय का गठन

  • 1950 में – एक मुख्य न्यायाधीश + 7 अन्य न्यायाधीश। 
  • 1956 में – एक मुख्य न्यायाधीश + 10 अन्य न्यायाधीश। 
  • 2009 में – एक मुख्य न्यायाधीश + 30 अन्य न्यायाधीश। 
  • जुलाई 2019 में – एक मुख्य न्यायाधीश + 33 अन्य न्यायाधीश।

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति कैसे होती है?

  • शुरुआत में – राष्ट्रपति के द्वारा उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के सलाह पर सामान्यत: वरिष्ठतम न्यायाधीश को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया जाता था।
  • 1993 से – राष्ट्रपति के द्वारा कॉलेजियम प्रणाली (सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश + 2 वरिष्ठतम न्यायाधीशों) की सलाह पर मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति की जाती थी। राष्ट्रपति को कॉलेजियम की सलाह मानने की बाध्यता थी।
  • 1998 से – राष्ट्रपति के द्वारा कॉलेजियम प्रणाली (सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश + 4 वरिष्ठतम न्यायाधीशों) की सलाह पर। अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया की वह कॉलेजियम के फैसले को एक बार लौटा सकते हैं।
  • 2014 में 99 वां संविधान संशोधन अधिनियम एवं न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम के तहत राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) की स्थापना।

NJAC के सदस्य –

  1. सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश 
  2. एक वरिष्ठतम न्यायाधीश 
  3. कानून मंत्री 
  4. दो मंत्रीपरिषद के सदस्य

NJAC के कार्य –

  1. सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एवं अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति। 
  2. उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एवं अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति। 
  3. न्यायाधीशों का स्थानांतरण करना।
  • 2015 में – “फोर्थ जजेस केस” – ‘सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन एंड अनदर’ बनाम ‘यूनियन ऑफ इंडिया’। इसमें यह निर्णय लिया गया कि NJAC प्रणाली न्यायपालिका की स्वतंत्रता को प्रभावित करेगी अतः NJAC को समाप्त कर दिया गया और पुन: 2015 में कॉलेजियम व्यवस्था लागू की गई। 
  • 2018 में मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर का गठन – मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (M.O.P) – सरकार के द्वारा बनाया गया एक ऐसा डॉक्यूमेंट है जिसमें उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के तरीके बताए गए हैं।

प्रावधान

  1. वरिष्ठता योग्यता और अखंडता के आधार पर न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाएगी।
  2. उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों में एक सेक्रेट्रियट का गठन करना।
  3. वरिष्ठतम न्यायाधीश की नियुक्ति को नजरअंदाज करने पर लिखित रूप में कारण बताना।
  4. इसकी सहायता के लिए एक समिति का गठन किया जा सकता है।

मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर के लाभ

  1. सरकार और न्यायपालिका के बीच टकराव कम होगा। 
  2. पक्षपात कम होगी। 
  3. योग्यता को वरीयता मिलेगी। 
  4. पारदर्शिता आएगी। 
  5. समय की बचत होगी।

नोट : इस प्रक्रिया से बनने वाले उच्चतम न्यायालय के प्रथम न्यायाधीश – “रंजन गोगोई”।
न्यायाधीशों की अर्हताएं 

  • भारत का नागरिक होना चाहिए। 
  • उच्च न्यायालय में 5 वर्ष तक जज के तौर पर कार्य किया हो। अब तक इस वर्ग के ही जज सर्वाधिक नियुक्त हुए हैं।
  • उच्च न्यायालय में 10 वर्ष तक एडवोकेट के तौर पर कार्य किया हो। अब तक इस वर्ग के 8 जज ही नियुक्त हुए हैं जिसमें से सिर्फ एक महिला इंदु मल्होत्रा 2017 है।
  • राष्ट्रपति के नजर में न्यायवादी हो। अभी तक ऐसे कोई जज नियुक्त नहीं हुए हैं।

सर्वोच्च न्यायालय में अब तक महिला न्यायाधीश कुल – आठ 

  • पहली महिला न्यायाधीश – मीरा साहिब फातिमा बीबी (1989) 
  • 2019 में कार्यरत महिला न्यायाधीश 
  • इंदु मल्होत्रा 
  • इंदिरा बनर्जी 
  • आर. भानुमति (पहली एस.सी. महिला) 

शपथ 

  • राष्ट्रपति के समक्ष 
  • भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूंगा 
  • भारत के संविधान और विधियों का मर्यादा बनाए रखूंगा 
  • भारत की प्रभुता और अखंडता को अक्षुण्ण रखूंगा 
  • अपनी पूरी योग्यता, ज्ञान और विवेक से अपने पद के कर्तव्यों का निर्भय और निष्पक्ष होकर पालन करूंगा 

कार्यकाल

  • 65 वर्ष की आयु तक 
  • खुद से त्यागपत्र राष्ट्रपति को देकर 
  • संसद की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा (यह एक जटिल प्रक्रिया होती है)

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया

  • मुख्य न्यायाधीश को महाभियोग जैसी प्रक्रिया के द्वारा हटाया जा सकता है जो निम्नलिखित कई चरणों से गुजरता है –
  1. लोकसभा में 100 सदस्यों के हस्ताक्षर के साथ अध्यक्ष की स्वीकृति या राज्यसभा में 50 सदस्यों के हस्ताक्षर के साथ सभापति की स्वीकृति होनी चाहिए।
  2. अध्यक्ष/सभापति की स्वीकृति के बाद यह रिपोर्ट एक 3 सदस्ययी समिति (जिसमे सर्वोच्च न्यायालय के एक अन्य न्यायाधीश, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एवं प्रतिष्ठित न्यायवादी शामिल होते हैं) के पास जाती है। यह समिति दुर्व्यवहार, अक्षमता या कदाचार में लिप्त होने पर ही इसे स्वीकृति देती है।
  3. समिति के बाद इसे दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत से पास होना पड़ता है।
  4. दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत से पास हो जाने के बाद यह राष्ट्रपति के पास भेज दिया जाता है और अंत में राष्ट्रपति आदेश जारी कर देते हैं।

न्यायाधीशों के वेतन भत्ते 

  • न्यायाधीशों को दिए जाने वाले वेतन भत्ते देश के संचित निधि से भारित व्यय के रूप में दिए जाते हैं सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का वेतन = 2.8 लाख। 
  • सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों के वेतन = 2.5 लाख। 
  • उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का वेतन = 2.5 लाख। 
  • उच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों का वेतन = 2.25 लाख।

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