आधुनिक भारतीय इतिहास लेखन के प्रमुख उपागम

आधुनिक भारतीय इतिहास लेखन के प्रमुख उपागम

आधुनिक भारतीय इतिहास लेखन के प्रमुख उपागम आधुनिक भारतीय इतिहास को अलग-अलग इतिहासकारों के संप्रदायों ने अलग-अलग नजरिए से लिखा है। इस आर्टिकल में हम यही जानने और समझने का प्रयास करेंगे कि प्रत्येक संप्रदाय आधुनिक भारतीय इतिहास को किस नजरिए से देखता है।

आधुनिक भारतीय इतिहास लेखन के प्रमुख उपागम निम्नलिखित हैं

औपनिवेशिक उपागम

औपनिवेशिक उपागम के अंतर्गत भारत को सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक जैसे कई रूपों में पिछड़ा देश बताया गया है। भारत को एक ऐसा देश बताया गया है जिसका विकास अवरुद्ध है। दूसरी तरफ ब्रिटेन को समृद्ध एवं उत्कृष्ट सभ्यता वाला देश बताया गया है। अतः औपनिवेशिक उपागम उपनिवेश स्थापित करने वाले देशों का गुणगान करता है और यह कहता है कि इन्होंने अपने-अपने उपनिवेशों को विकसित होने में मदद की है। औपनिवेशिक उपागम के पक्ष में लिखने वाले कुछ प्रमुख इतिहासकारों के नाम हैं – माउंटस्टुअर्ट एल्फिंस्टन, जेम्स मिल और विंसेंट स्मिथ इत्यादि।

कैंब्रिज स्कूल उपागम

आधुनिक भारतीय इतिहास लेखन के प्रमुख उपागम
कैंब्रिज स्कूल

कैंब्रिज स्कूल उपागम के अंतर्गत इतिहासकारों ने साम्राज्यवाद या औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध भारत वासियों के संघर्ष को बताने के बजाय यह बताया है कि औपनिवेशिक शासन के द्वारा दिए जाने वाले लाभों और शक्तियों के लिए भारत के लोग आपस में संघर्ष कर रहे थे।

राष्ट्रवादी उपागम

राष्ट्रवादी उपागम के इतिहासकार औपनिवेशिक उपागम एवं कैंब्रिज स्कूल उपागम को मानने से इनकार करते हैं। राष्ट्रवादी उपागम के अनुसार औपनिवेशिक शासन भारत के धन संपदा को लूटने और इसका शोषण करने के लिए आए थे तथा इसके लिए वे किसी भी हद तक जा सकते थे। राष्ट्रवादी उपागम राष्ट्रीय हित के लिए अंग्रेजों के विरुद्ध किए गए आंदोलनों के पक्षधर हैं।
राष्ट्रवादी उपागम के अंतर्गत आने वाले प्रमुख इतिहासकार हैं – गोपाल कृष्ण गोखले, एम.जी. रानाडे, दादा भाई नौरोजी, आर.सी. दत्त, वी.के.आर.वी. राव एवं के.टी. शाह इत्यादि।

मार्क्सवादी उपागम

कार्ल मार्क्स

मार्क्सवादी उपागम के इतिहासकारों ने औपनिवेशिक शासन द्वारा अपने अधीन उपनिवेशों पर किए गए अत्याचारों एवं शोषण का वर्णन किया है साथ ही साथ दूसरी तरफ राष्ट्रवादियों के बीच आपसी संघर्ष को भी उजागर किया है। इस प्रकार मार्क्सवादी उपागम ज्यादा सटीक प्रतीत होता है और इसी कारण इसने भारतीय इतिहास लेखन को ज्यादा प्रभावित किया।

संप्रदायवादी उपागम

संप्रदायवादी उपागम के अंतर्गत लिखने वाले इतिहासकारों का मानना है कि मध्यकालीन इतिहास मुख्य रूप से हिंदू मुस्लिम संघर्ष का दौर रहा। और इसके बाद यह संघर्ष आधुनिक भारत के इतिहास तक जारी रहा। संप्रदायवादी उपागम मुख्य रूप से हिंदू – मुस्लिम के बीच के संघर्ष को दर्शाता है।

नारीवादी उपागम

नारीवादी उपागम के अंतर्गत मुख्य रूप से आधुनिक भारतीय इतिहास में महिलाओं की स्थिति एवं भूमिका को दर्शाया गया है। इसके अंतर्गत महिलाओं पर किए जाने वाले अत्याचारों के विरुद्ध महिलाओं द्वारा किए गए आंदोलनों एवं महत्वपूर्ण योगदानो का जिक्र मिलता है।
इसके अंतर्गत आने वाली प्रमुख लेखिकाएं हैं – बी.आर. नंदा, पंडिता रमाबाई और कैथरीन मेयो इत्यादि।

उदारवादी एवं नव उदारवादी उपागम

उदारवादी एवं नव उदारवादी उपागम के अंतर्गत इतिहासकारों का मानना है कि उपनिवेशवाद के कारण उपनिवेशों का उद्धार हुआ है, आर्थिक वृद्धि हुई है। जबकि दूसरी तरफ इनका यह भी कहना है कि इससे ब्रिटिश व्यापारी हतोत्साहित हुए हैं और ब्रिटेन की औद्योगिक विकास प्रभावित हुई है। इस उपागम के अंतर्गत आने वाले प्रमुख इतिहासकार हैं – पैट्रिक ओ. ब्राइन, कैन एवं हॉपकिंस, डेविस एवं हट्टन बैक इत्यादि।

अधीनस्थ/उपाश्रित उपागम

अधीनस्थ एवं उपाश्रित उपागम के इतिहासकारों का यह मानना है कि भारतीय समाज मे जो भी विरोध एवं संघर्ष था वह कभी भारतीयों एवं विदेशियों के बीच में था ही नहीं, बल्कि यह संघर्ष तो उपाश्रितों और कुलीन, भारतीय एवं विदेशियों के बीच था।

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