आंग्ल सिक्ख युद्ध

आंग्ल सिक्ख युद्ध

आंग्ल सिक्ख युद्ध

गुरु अंगद 1539 से 1552

गुरु अंगद सिक्खों के दूसरे गुरु थे इनका प्रारंभिक नाम लहना था। उन्होंने गुरु नानक द्वारा लागू किए गए लंगर व्यवस्था को स्थाई बनाया तथा गुरुमुखी लिपि का आरंभ किया।

गुरु अमरदास 1552 से 1574

गुरु अमरदास सिखों के तीसरे गुरु थे इन्होंने लहंगा नामक एक अलग विवाह पद्धति की शुरुआत की थी। इनकी एक पुत्री थी जिसका नाम बीबी भानी था जिसका विवाह बाद में गुरु रामदास से हुआ।

गुरु रामदास 1574 से 1581

गुरु रामदास सिक्खों के चौथे गुरु थे इन्होंने अमृतसर जला से और अमृतसर नगर की स्थापना की इनके पुत्र का नाम अर्जुन देव था जो सिक्खों के पांचवे गुरु बने।

गुरु अर्जुन देव 1581 से 1606

गुरु अर्जुन देव सिक्खों के पांचवे गुरु थे इन्होंने आदि ग्रंथ की रचना की तथा अमृतसर जिला से के मध्य में हरमंदिर साहब का निर्माण कराया। राजकुमार खुसरो की सहायता करने के कारण जहांगीर ने इन्हें मरवा दिया था।

गुरु हरगोविंद 1606 से 1645

गुरु हरगोविंद सिक्खों के छठे गुरु हुए इन्होंने सिक्खों को सैन्य संगठन का रूप दिया तथा अकालतख्त यानी ईश्वर के सिंहासन का निर्माण कराया।

गुरु हरराय 1645 से 1661

गुरु हर राय सिखों के सातवें गुरु हुए। दारा शिकोह इनसे मिलने आया था।

गुरु हरकिशन 1661 से 1664

गुरु हरकिशन सिखों के आठवें गुरु थे इन्होंने औरंगजेब के दरबार में जाकर उसे गुरु पद के बारे में समझाया था। इसकी मृत्यु चेचक से हो गई थी।

गुरु तेग बहादुर 1664 से 1675

गुरु तेग बहादुर सिक्खों के 9वें गुरु हुए। औरंगजेब ने इस्लाम ना कबूल करने पर इनकी हत्या करवा दी थी।

गुरु गोविंद सिंह 1675 से 1708

गुरु गोविंद सिंह सिखों के दसवें गुरु थे। इनका जन्म 26 दिसंबर 1666 ईस्वी को पटना में हुआ था। इनके पिता ‘गुरु तेग बहादुर’ तथा माता ‘गुजरी’ थी।गुरु गोविंद सिंह ने खालसा पंथ, नाम के बाद सिंह लगाना, खुद को सच्चा पादशाह कहना, आदिग्रंथ को गुरु मानना तथा पाहुल प्रणाली जैसी परंपराओं की शुरुआत की थी। इन्होंने पांच ककार केश कंघा कक्षा कला कृपाल को सिखों के लिए अनिवार्य कर दिया। इनके 4 पुत्र थे अजीत सिंह जुझार सिंह फतेह सिंह और जोरावर सिंह। जिनमें से फतेह सिंह और जोरावर सिंह को मुगल फौजदार वजीर खान ने दीवार में चुनवा दिया था। गुरु गोविंद सिंह ने सिखों के धार्मिक ग्रंथ आदि ग्रंथ को वर्तमान रूप दिया और कहा कि अब गुरु वाणी सिख संप्रदाय के गुरु का कार्य करेगी। अतः सिखों के 10वें और अंतिम गुरु गुरु गोविंद सिंह हुए। 1708 में गुल खान नामक पठान ने नांदेड़ नामक स्थान पर गुरु गोविंद सिंह की हत्या कर दी थी।

बंदा बहादुर

बंदा बहादुर का जन्म 1670 ईस्वी में पंजाब के पुंछ जिले के रजौली नामक गांव में हुआ था। इनका बचपन का नाम लक्ष्मण दास था। इनके पिता का नाम रामदेव भारद्वाज था। इन्होंने गुरु नानक एवं गुरु गोविंद सिंह के नाम के सिक्के चलाए थे। इन्होंने भाटी और जोरावर सिंह की हत्या करने वाले मुगल फौजदार वजीर खान की हत्या कर दी तथा शहादरा में बंदा बहादुर ने हजारों मुगल सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था अतः शाहदरा को कत्ल घड़ी के नाम से जाना जाता है। अंत में फर्रूखसियर ने 1700 ईस्वी में गुरदासपुर के नांगल नामक स्थान पर इसकी हत्या करवा दी थी। बंदा बहादुर की मृत्यु के पश्चात सिखों का मुख्य दल खालसा बना बाद में दल खालसा 12 मिसलों में विभाजित हो गया।

रणजीत सिंह

रणजीत सिंह का जन्म 2 नवंबर 1780 इस्वी को गुजरांवाला (पाकिस्तान) में हुआ था। इनके पिता का नाम महासिंह और माता का नाम राज कौर था। इनके पिता महासिंह 12 मिसलों में सबसे प्रमुख मिसल सुकरचकिया मिसल के सरदार थे, अतः इनका जन्म सुकरचकिया मिसल में हुआ था। 1798-99 ईस्वी में रणजीत सिंह लाहौर का शासक बना। 25 अप्रैल 1809 ईस्वी को रणजीत सिंह और चार्ल्स मेटकाॅफ के बीच अमृतसर की संधि हुई। 7 जून 1839 ईस्वी को लाहौर (पाकिस्तान) में रणजीत सिंह की मृत्यु हो गई। इन्हें ‘शेर-ए-पंजाब’ के नाम से जाना जाता था।

रणजीत सिंह की उपलब्धियां

सिक्ख साम्राज्य का अत्यधिक विस्तार हुआ
1773 के अंत तक उत्तर में जम्मू कश्मीर के कुछ हिस्सों तक दक्षिण में मुल्तान तक पूर्व में सहारनपुर तक पश्चिम में अटक तक तथा पंजाब के समस्त मैदानी भागों तक।
1799 में अफगानिस्तान के शासक जमानशाह से लाहौर भेंट रूप में प्राप्त किया।
1805 ईस्वी तक अमृतसर एवं जम्मू कश्मीर पर 1811 में कांगड़ा पर 1819 में कश्मीर पर और 1823 में पेशावर पर अधिकार स्थापित किया।

सिक्खो का एकीकरण किया
सिख संप्रदाय जो 12 मिस्लों (सुकरचकिया,आहलूवालिया, रामगढ़िया, फैज्जुलापुरिया, डलवालिया, भांगी, नकाई, कन्हैया, सिंहिया, करोड़ा, निशानवाला, फुलकिया) मे विभाजित थी, को एकीकृत किया।

अन्य शासकों से अच्छे संबंध स्थापित किए
नेपालियों अफ़गानों अंग्रेजों और डोंगरों से अच्छे संबंध स्थापित किए। इसी वजह से 1809 में अंग्रेजों के साथ अमृतसर की संधि हुई जिसके तहत सतलज नदी को दोनों राज्यों के बीच का सीमा मान लिया गया। 1814 में अफगानिस्तान के शासक ने रणजीत सिंह को कोहिनूर हीरा भेंट किया था।

सैन्य शक्ति का विस्तार किया
रणजीत सिंह ने अपने सैन्य शक्तियों का काफी विस्तार किया। अपने समय के सभी क्षेत्रीय शक्तियों में रणजीत सिंह की सेना सर्वाधिक बड़ी थी।

प्रथम आंग्ल सिक्ख युद्ध (1845 – 1846)

रणजीत सिंह के मृत्यु के पश्चात सिक्ख साम्राज्य में कोई योग्य उत्तराधिकारी नहीं हुआ। रणजीत सिंह के बाद उसका पुत्र खड़क सिंह गद्दी पर बैठा। कुछ ही समय पश्चात उसकी मृत्यु हो गई। मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र नव निहाल सिंह गद्दी पर बैठा परंतु उसकी भी जल्द ही मृत्यु हो गई। उसके पश्चात रणजीत सिंह के एक और पुत्र दलीप सिंह गद्दी पर बैठा जो अभी भी अव्यस्क था। अत: प्रतिशासन व्यवस्थापक के रूप में रानी जींद को नियुक्त किया गया। दिसंबर 1845 ईस्वी में पंजाब की सेना ने राजा दलीप सिंह और रानी जींद से जबरन आज्ञा लेकर सतलज जो कि अमृतसर की संधि के तहत सिक्ख राज्य एवं अंग्रेजी राज्य की सीमा मानी गई थी, के पार आक्रमण कर दिया। इस दौरान सिक्खों की कई बार पराजय हुई। अंततः 1846 में लाहौर की संधि के तहत यह युद्ध शांत हुआ। इस संधि के तहत सतलज के आसपास के प्रदेश एवं दुर्ग अंग्रेजों को देने पड़े। अंग्रेजी सेना को पंजाब में निर्बाध रूप से विचरण करने का अधिकार दिया गया। पंजाब में अन्य विदेशियों को नौकरी देना प्रतिबंधित कर दिया गया। यह सिक्खों के लिए एक अपमानजनक संधि थी। अतः सिक्खों ने विद्रोह कर दिया, परंतु इसका कोई फायदा नहीं हुआ बल्कि 1846 में एक और संधि हो गई जिसे भैरोंवाल की संधि कहते हैं। इस संधि के तहत रानी जींद को उसके पद से हटाकर उसके स्थान पर एक 8 सदस्यी परिषद की गठन की गई, जिसके सदस्य अंग्रेज रेजिडेंट हेनरी लॉरेंस की अध्यक्षता में चुने गए। और इस प्रकार पूरे पंजाब पर अंग्रेजों का अप्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित हो गया।

द्वितीय आंग्ल सिक्ख युद्ध (1840 – 1849)

प्रथम आंग्ल मैसूर युद्ध के बाद हुए लाहौर की संधि और भैरोंवाल की संधि सिक्खों के लिए बहुत अपमानजनक था। सिक्खों में इसके प्रति काफी रोष था। अतः अप्रैल 1848 ईस्वी में सिक्खों ने दो अंग्रेज अधिकारियों की हत्या कर दी। इस प्रकार की और भी कई घटनाएं होती रही। अंततः फरवरी 1849 ईस्वी में अंग्रेजों ने गुजरात के युद्ध में सिक्खों को पूर्ण रूप से पराजित कर दिया तथा गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने पंजाब राज्य को ब्रिटिश राज्य में मिला लिया और महाराजा दलीप सिंह को वार्षिक पेंशन के लिए राजी कर इंग्लैंड भेज दिया। इस प्रकार अंग्रेजों ने पंजाब राज्य पर भी पूर्णरूपेण अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया।

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