आंग्ल मैसूर युद्ध

आंग्ल मैसूर युद्ध
आंग्ल मैसूर युद्ध

आंग्ल मैसूर युद्ध जिस समय उत्तर भारत में मुगलों का शासन चल रहा था उस समय दक्षिण भारत में विजयनगर और बहमनी साम्राज्य का आधिपत्य था। 1565 ईस्वी में दोनों साम्राज्यों के बीच तालीकोटा का ऐतिहासिक युद्ध हुआ, जो दोनों साम्राज्यों के पतन का कारण बना। इससे दोनों साम्राज्य छोटे-छोटे राज्यों में बिखर गए। विजयनगर साम्राज्य के अवशेषों में एक अवशेष मैसूर था। कुछ समय पश्चात मैसूर में एक नए वंश ‘वाडयार वंश’ का उदय हुआ। इस वंश ने लगभग 200 वर्षों तक मैसूर पर शासन किया। इसके अंतिम शासक ‘चिक्का कृष्णराज वाडयार द्वितीय’ थे, जिनका शासनकाल 1734 से 1766 ईस्वी तक था। इसके शासन की वास्तविक शक्ति दो मंत्री भाइयों देवराज एवं नंदराज के हाथों में थी। नंदराज ने 1749 ईस्वी में हैदर अली को अपनी सेना में एक सैनिक के रूप में नियुक्त किया। हैदर अली का जन्म 1722 ईस्वी में बोदीकोट (मैसूर) में हुआ था। यह बचपन से ही बड़ा साहसी था। इसने कम उम्र में ही घुड़सवारी, तलवारबाजी तथा युद्ध के अन्य कौशल सीख लिए थे। इनके पिता का नाम फतह मोहम्मद था, जो मैसूर की सेना में एक सैनिक थे। अपने पिता की मृत्यु के पश्चात वह मैसूर की सेना में शामिल हो गया। हैदर अली की योग्यता और कुशलता को देखते हुए नंदराज ने 1755 इस्वी में उसे डिंडीगुल का फौजदार नियुक्त किया। इस समय मैसूर की राजधानी श्रीरंगपट्टनम थी और इसी बीच श्रीरंगपट्टनम की राजनीतिक स्थिति बिगड़ती जा रही थी तथा दूसरी तरफ मराठों का आक्रमण का खतरा भी बढ़ता जा रहा था। ऐसे में हैदर अली डिंडीगुल से श्रीरंगपट्टनम आते हैं और अपनी योग्यता सिद्ध करते हुए स्थिति को सामान्य करने में सफल होते हैं। अंततः 1761 इस्वी में हैदर अली स्वयं को मैसूर का शासक घोषित कर देता है।

प्रथम आंग्ल मैसूर युद्ध (1767 – 1769)

आंग्ल मैसूर युद्ध 1764 के बक्सर के युद्ध के बाद अंग्रेजों की महत्वाकांक्षा काफी बढ़ गई थी। वे अपने साम्राज्य विस्तार के लिए नीतियां बनाना शुरु कर चुके थे। इसी सिलसिले में दक्षिण भारत के राज्य जिनके पास समुद्र तट थे, उनके लिए व्यापारिक दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण थे। ऐसे में जब उन्हें मैसूर की स्थिति के बारे में पता चलता है, जो इस समय मराठों के आक्रमण का सामना कर रहे थे। तब अंग्रेज हैदराबाद के निजाम को अपने साथ मिलाकर मैसूर पर आक्रमण करने के लिए उकसाता है। जब हैदर अली को इस बात का पता चलता है कि अंग्रेज अकारण ही उस पर आक्रमण करवा रहा है तो वह अंग्रेजों को ही पहले सबक सिखाने कर निश्चय करता है। वह मराठों और निजामो से संधि कर 1767 ईस्वी में अंग्रेजों पर आक्रमण कर देता है। पहले चरण में हैदर अली पराजित हो जाता है। हैदर अली के पराजित होते ही निजाम पुन: जाकर अंग्रेजों से मिल जाते हैं। निजाम के इस धोखे से हैदर अली बहुत क्रोधित होता है और पुनः अपनी सेना तैयार करता है और अंग्रेजों पर आक्रमण कर देता है। इस बार वह अंग्रेजों की प्रशिक्षित सेना को बहुत बुरी तरह हराता है तथा उन्हें मद्रास तक खदेड़ देता है। अपनी स्थिति बिगड़ती देख अंग्रेज हैदर अली से मद्रास की संधि कर लेते हैं। इस संधि के तहत कई बातें तय हुई जिसमें से एक बात यह थी कि अंग्रेज हैदर अली को युद्ध का खर्च व जुर्माना देंगे तथा जरूरत पड़ने पर मैसूर को सैनिक सहायता भी देंगे। यह संधि अंग्रेजों की मात्र एक चाल थी जिससे उन्हें पुनः अपनी सेना तैयार करने का मौका मिल सके। और अवसर मिलने पर वे अपनी नई कूटनीतिक चाल चल सके।

द्वितीय आंग्ल मैसूर युद्ध (1780 – 1784)

आंग्ल मैसूर युद्ध मद्रास की संधि के पश्चात कुछ समय तक अंग्रेजों और मैसूर के बीच शांति बनी रही, परंतु इधर मराठों और मैसूर के बीच तनाव की स्थिति बनी रही। 1771 ईस्वी में मराठों ने एक बार फिर मैसूर पर आक्रमण कर दिया। मद्रास की संधि के अनुसार अंग्रेजों को इस युद्ध में मैसूर को सैन्य सहायता देनी थी, परंतु न तो उन्होंने सैनिक सहायता दी बल्कि इसके विपरीत उन्होंने फ्रांसीसियों की बस्ती माहे पर आक्रमण कर उस पर अधिकार कर लिया, जो हैदर अली के राज्यक्षेत्र के अंतर्गत आती थी। अंग्रेजों के इस बर्ताव से हैदर अली बड़ा नाखुश हुआ और उसने मराठों और निजामो से एक संधि कर ली जो पहले से अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ रहे थे। हैदर अली ने 1780 में कर्नाटक पर आक्रमण कर दिया और और अंग्रेज जनरल बेली को परास्त कर 1780 ईस्वी में अर्काट पर अधिकार कर लिया। इस तरह द्वितीय आंग्ल मैसूर युद्ध प्रारंभ हो गया। अंग्रेज इस हार से बहुत शर्मिंदगी महसूस कर रहे थे क्योंकि अभी-अभी उन्होंने 1764 ईस्वी में बक्सर जैसे ऐतिहासिक युद्ध में विजय हासिल की थी और अब हैदर अली से उन्हें परास्त होना पड़ रहा था। ऐसे में अंग्रेज गवर्नर वारेन हेस्टिंग ने पुनः एक चाल चली और निजाम, सिंधिया और भोसले के साथ संधि कर उन्हें अपने में मिला लिया। 1780 ईस्वी में ही अंग्रेज गवर्नर आयरकूट और हैदर अली के बीच पोर्टानोवा का युद्ध हुआ, जिसमें हैदर अली पराजित हुआ। 2 वर्ष पश्चात उसने एक बार फिर अपनी शक्ति एकत्रित की और आयरकूट पर आक्रमण कर दिया। इस बार वह आयरकूट को हराने में सफल रहा। परंतु इसके बाद 1782 में ही हैदर अली की मृत्यु हो गई और अब उसके पुत्र टीपू सुल्तान को नेतृत्व संभालना पड़ा। टीपू सुल्तान ने इस युद्ध को जारी रखा परंतु अंग्रेजों को पूरी तरह से मात देने में सफल ना हो सका। उधर अंग्रेज भी आंग्ल-मराठा युद्ध में व्यस्त थे, अतः वे भी अब थक चुके थे तथा इस इस स्थिति में नहीं थे कि वे टीपू सुल्तान को पराजित कर सके। अतः मार्च 1784 इस्वी में दोनों पक्षों के बीच मंगलौर की संधि हुई जिसके तहत दोनों पक्षों ने एक दूसरे के भूभागों को लौटाने पर सहमत हुए और इस तरह द्वितीय आंग्ल मैसूर युद्ध बराबरी में रहा और इसका कोई ठोस परिणाम नहीं निकला।

तृतीय आंग्ल मैसूर युद्ध (1790 – 1792)

आंग्ल मैसूर युद्ध 1782 ईस्वी में अंग्रेजों ने मराठों के साथ सालबाई की संधि करके 20 वर्षों के लिए अवकाश प्राप्त कर लिया था। अतः अब उनका पूरा ध्यान मैसूर को विजित करने पर केंद्रित था। अंग्रेजों ने टीपू सुल्तान को हराने और मैसूर को जीतने के लिए फिर से कूटनीतिक चालें चलना प्रारंभ कर दी थी। 1788 ईस्वी में अंग्रेजों ने हैदराबाद के निजाम को फिर से अपने पक्ष में करके टीपू पर आक्रमण करने के लिए उकसाया। टीपू को जब इस बात की भनक लगी तो उसने इसे मंगलौर की संधि का उल्लंघन माना। फिर टीपू ने युद्ध के लिए स्वयं पहल कर दी और 1789 ईस्वी में त्रावणकोर पर आक्रमण कर दिया। अंग्रेज तो इस ताक में थे कि कैसे उन्हें मैसूर के साथ युद्ध करने का मौका मिले और टीपू के इस आक्रमण से उन्हें मैसूर के साथ युद्ध करने का मौका मिल ही गया क्योंकि त्रावणकोर का राजा अंग्रेजों का मित्र था। अंग्रेजों ने पुनः मराठों और निजाम से संधि कर ली। सेनापति जनरल मीडो के नेतृत्व में अंग्रेजों ने टीपू पर पहला आक्रमण किया। टीपू की स्थिति मजबूत होने के वजह से इस आक्रमण का अंग्रेजों को कोई खास सफलता प्राप्त नहीं हुआ। दूसरी बार लॉर्ड कार्नवालिस ने नेतृत्व संभाला और मार्च 1791 ईस्वी तक उसने वेल्लोर और अंबूर पर अधिकार कर लिया। कर्नवालिस का अभियान टीपू की राजधानी श्रीरंगपट्टनम तक जा पहुंची परंतु वर्षा ऋतु आ जाने के कारण उसे वहीं तक अपना अभियान रोकना पड़ा। 1791 में वर्षा ऋतु के समाप्त होने पर टीपू ने अपना बदला लेते हुए कोयंबटूर पर आक्रमण कर दिया तथा उसे अपने अधिकार में ले लिया। इधर कार्नवालिस की सहायता के लिए विशाल सेना तथा मैक्सवेल, मीडो और हंटर जैसे कुशल सैन्य अधिकारी आ गए। इस बार कार्नवालिस ने अपनी पूरी सामर्थ्य के साथ टीपू पर आक्रमण किया और टीपू ने भी डटकर उनका सामना किया। अंततः टीपू को उनके सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा और मार्च 1792 ईस्वी में उसे श्रीरंगपट्टनम की संधि स्वीकारनी पड़ी। यह संधि टीपू के लिए एक अपमानजनक संधि थी, क्योंकि इसके तहत टीपू को अपने आधे राज्य अंग्रेजों को देने पड़े। साथ ही साथ युद्ध के हर्जाने के रूप में 3 करोड़ रुपए देने पड़े और अपने दो बेटों को अंग्रेजों के पास बंधक के रूप में भी रखना पड़ा।

चतुर्थ आंग्ल मैसूर युद्ध (मार्च 1799 – मई 1799)

आंग्ल मैसूर युद्ध श्रीरंगपट्टनम की अपमानजनक संधि टीपू सुल्तान जैसे स्वाभिमानी शासक को अंदर ही अंदर कचोटती रही। इस दौरान उसने पुनः अपने सैन्य शक्ति जुटाने का प्रयास किया तथा अरब, अफगानिस्तान, कुस्तुनतुनिया तथा मॉरीशस जैसे देश के शासकों से सैन्य सहायता के लिए बात की। उसने महान शासक नेपोलियन को भी पत्र लिखा। फ्रांसीसियों के साथ उसका संबंध पहले से ही अच्छा था। उसने अपनी सेना को फ्रांसीसी पद्धति के अनुसार प्रशिक्षित किया। अंततः मार्च 1799 ईस्वी में उसने अंग्रेजों पर आक्रमण कर दिया। दो घमासान युद्धों के पश्चात टीपू सुल्तान पराजित हुआ और उसने अपनी राजधानी श्रीरंगपट्टनम के किले में शरण ली। अंततः 4 मई 1799 को अंग्रेजों द्वारा टीपू सुल्तान किले की रक्षा करते हुए मारा गया।

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