आंग्ल मराठा युद्ध

आंग्ल मराठा युद्ध
आंग्ल मराठा युद्ध

आंग्ल मराठा युद्ध

  • आंग्ल मराठा युद्ध मराठा साम्राज्य के संस्थापक शिवाजी थे। इनका जन्म अप्रैल 1627 ईस्वी में शिवनेर दुर्ग(जिला पुणे, महाराष्ट्र) में हुआ था। इनके पिता का नाम शाहजी भोंसले और माता जीजाबाई थीं। इसने अपने शासनकाल में अपने साम्राज्य का काफी विस्तार किया।
  • 3 अप्रैल 1680 इस्वी को 53 वर्ष की आयु में शिवाजी की मृत्यु हो गई।
  • इनके पश्चात इनके वंशज इस साम्राज्य के उत्तराधिकारी बने जिसमें संभाजी (1680 से 1689), राजाराम प्रथम(1689 से 1700 ), शिवाजी द्वितीय ( 1700 से 1707) और साहूजी (1708 से 1749) थे। साहूजी शिवाजी के वंशजों में अंतिम शासक हुए। इनकी मृत्यु 1749 में हो गई। इस समय तक मराठा साम्राज्य काफी विस्तृत हो चुका था। पुणे में पेशवा नागपुर में भोसले, ग्वालियर में सिंधिया, बड़ौदा में गायकवाड, इंदौर में होलकर शासन कर रहे थे। इनके पश्चात मराठा साम्राज्य में पेशवाओं का शासन प्रारंभ हो गया जिसमें प्रथम पेशवा बालाजी विश्वनाथ(1713 से 1720) बने। बालाजी विश्वनाथ के पश्चात इनके उत्तराधिकारी बाजीराव प्रथम(1720 से 1740) ने पेशवा का पद धारण किया। बाजीराव प्रथम के पश्चात बालाजी बाजीराव (1740-1761) पेशवा बने। इस समय तक मराठा साम्राज्य काफी अच्छी स्थिति में थी। परंतु 1761 ईस्वी में भारत में अहमद शाह अब्दाली का आक्रमण हुआ और मराठों और अहमद शाह अब्दाली के बीच पानीपत में पानीपत की तीसरी लड़ाई हुई, जिसमें मराठा बुरी तरह पराजित हुए। बालाजी बाजीराव इस पराजय को स्वीकार नहीं कर पाए और 1761 में उनकी मृत्यु हो गई। इस लड़ाई से मराठा कमजोर हो गए और
  • बालाजी बाजीराव के मृत्यु के पश्चात इनके उत्तराधिकारियों में षडयंत्र एवं लड़ाइयां होनी शुरू हो गई, जिसके वजह से मराठा साम्राज्य स्थिर नहीं रह पाया।

प्रथम आंग्ल मराठा युद्ध (1775 – 1782)

प्रथम आंग्ल मराठा युद्ध
प्रथम आंग्ल मराठा युद्ध
  • आंग्ल मराठा युद्ध अंग्रेजों को मराठा साम्राज्य में हस्तक्षेप करने का मौका तब मिला जब बालाजी बाजीराव की मृत्यु के पश्चात उसका उत्तराधिकारी माधवराव प्रथम बना। इसने काफी हद तक मराठों की स्थिति को सुधारने का प्रयास किया। 1772 ईस्वी में उसकी मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के पश्चात उसका भाई नारायण राव गद्दी पर बैठा, जो उसके चाचा रघुनाथ राव को स्वीकार नहीं था, क्योंकि वह खुद गद्दी पर बैठना चाहता था। आत: उसने 1773 ईस्वी में नारायण राव की हत्या करके गद्दी पर बैठा। परंतु नाना फडणवीस के संरक्षण में 1774 ईस्वी में पुन: नारायण राव के पुत्र माधव राव द्वितीय ने उससे गद्दी छीन ली और स्वयं शासक बना।
  • ऐसे में रघुनाथ राव ने अंग्रेजों से सहायता मांगने मुंबई सरकार के पास पहुंचा तथा 7 मार्च 1775 ईस्वी को उनके बीच सूरत की संधि हुई। जिसके तहत रघुनाथ राव ने पेशवा पद के बदले अंग्रेजों को सालसेट एवं बेसिन का क्षेत्र देने का वादा किया साथ ही साथ कुछ जिलों के राजस्व में हिस्सा देने की भी बात कही। अतः अंग्रेजों ने रघुनाथ राव की सहायता के लिए 2500 अंग्रेजी सैनिकों की टुकड़ी सौंपी। फलस्वरूप अंग्रेजों ने इस युद्ध को जीत लिया परंतु मराठों पर पूरी तरह अधिकार नहीं कर पाए और एक संधि के तहत यह युद्ध शांत हो गया। 1777 ईस्वी में नाना फडणवीस ने फ्रांसीसियों को पश्चिमी तट पर पतन बनाने की मंजूरी दे दी, जिसे अंग्रेजों ने अपना अपमान माना और पुणे में मराठों के साथ फिर से संघर्ष हुआ। इस संघर्ष में मराठों ने महादजी सिंधिया के नेतृत्व में अंग्रेजों को भारी क्षति पहुंचाई और अंग्रेजों ने जनवरी 1779 में आत्मसमर्पण करके बड़गांव की संधि कर ली। इस संधि के तहत अंग्रेजों द्वारा जीते गए क्षेत्र वापस किए गए। परंतु वारेन हेस्टिंग ने इस संधि को मानने से इंकार कर दिया और कर्नल गोडार्ड के नेतृत्व में एक बड़ी सेना बनाई तथा फरवरी 1779 में अहमदाबाद पर और दिसंबर 1780 में बेसिन पर कब्जा कर लिया। अंततः फरवरी 1781 में अंग्रेजों ने सिपरी में सिंधिया को पराजित कर दिया इस पराजय के पश्चात मराठों और अंग्रेजो के बीच 1782 में सालबाई की संधि हुई। इस संधि के तहत अंग्रेजों ने जीते हुए सभी क्षेत्रों को वापस किया तथा 20 वर्षों तक शांति सुनिश्चित करने की बात कही। इस संधि से अंग्रेजों को मैसूर में हैदर अली से युद्ध करने का पर्याप्त समय मिला तथा अंग्रेजों को मराठों की शक्ति को भी मांपने में मदद मिली। इस प्रकार प्रथम आंग्ल मराठा युद्ध (1775 से 1782) तक चला।

द्वितीय आंग्ल मराठा युद्ध (1803 – 1805)

द्वितीय आंग्ल मराठा युद्ध
द्वितीय आंग्ल मराठा युद्ध

  • आंग्ल मराठा युद्ध 1794 ईस्वी में महादजी सिंधिया की मृत्यु हो गई तथा 1803 में नाना फडणवीस की भी मृत्यु हो गई।इसके पश्चात मराठों में कोई ऐसा योग्य शासक नहीं बचा जो पेशवा, सिंधिया, होल्कर, भोसले और गायकवाड को आपस में जोड़कर रख सके। इसके पश्चात मराठों में आंतरिक संघर्ष शुरू हो गया। नाना फडणवीस की मृत्यु के पश्चात पुणे का शासक बाजीराव द्वितीय बना। उधर ग्वालियर में दौलतराव सिंधिया तथा इंदौर में जशवंतराव होल्कर सरदार बन चुके थे। 1801 ईस्वी में बाजीराव द्वितीय और सिंधिया मिलकर जशवंतराव होल्कर के भाई बिठ्ठू जी होल्कर की हत्या कर दी। इससे जशवंतराव होलकर का क्रोध भड़क उठा और उसने पुणे पर आक्रमण कर पेशवा तथा सिंधिया की सेनाओं को पराजित कर दिया और पुणे पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। बाजीराव द्वितीय भागकर अंग्रेजों की शरण में पहुंचता है और 1802 ईस्वी में अंग्रेजों से एक संधि करता है जिसे ‘बेसिन की संधि’ के नाम से जाना जाता है। वैसे भी अंग्रेज अब यही चाहते थे कि समस्त भारत को सैनिक सहायता के लिए अंग्रेजों पर निर्भर बना दिया जाए। इसके लिए उन्होंने ‘सहायक संधि’ की शुरुआत की थी, लेकिन शुरुआत में मराठों ने इसे स्वीकार करने से मना कर दिया था। अतः अब उन्हें इस संधि के जरिए यह मौका मिल चुका था। इस संधि में बाजीराव द्वितीय अंग्रेजों को बहुत सारे वायदे करता है जिसके बदले अंग्रेजों के तात्कालिक गवर्नर जनरल वेलेजली 1803 इस्वी में पुणे पर आक्रमण करके इसे होल्कर से मुक्त करवाता है और बाजीराव द्वितीय को सौंप देता है। अब बाजीराव द्वितीय पुणे में अंग्रेजों की हाथों का कठपुतली मात्र रह गया था।
  • बाजीराव द्वितीय को अंग्रेजों की हाथों की कठपुतली बनता देख और पुणे पर अंग्रेजों का आधिपत्य स्थापित होता देख अन्य मराठा सरदारों को बहुत बुरा लगा। अत: भोसले और सिंधिया मिलकर बाजीराव द्वितीय को सबक सिखाने के लिए पुणे पर आक्रमण कर देते हैं। क्योंकि पूना अब अंग्रेजों के आधिपत्य में था इसलिए अंग्रेजों और मराठा सरदारों के बीच युद्ध शुरू हो जाता है।
  • इस युद्ध में मराठा सरदारों की हार होती है और 17 दिसंबर 1803 को अंग्रेजों और भोंसले के बीच ‘देवगांव की संधि’ होती है तथा 30 दिसंबर 18 से 3 को अंग्रेजों और सिंधिया के बीच ‘सूरजी अर्जन गांव की संधि’ होती है। अंत में 1805 को अंग्रेजों और होल्कर के बीच ‘राजपुर घाट की संधि’ होती है। राजपुर घाट की संधि के समय गवर्नर जनरल जॉर्ज बार्लो थे। बड़ौदा के गायकवाड़ इससे दूर ही थे। इस प्रकार 1805 ईस्वी में द्वितीय आंग्ल मराठा युद्ध समाप्त हुआ, जिसमें मराठा पूर्ण रूप से समाप्त तो नहीं हुए परंतु उनकी शक्ति अत्यंत निर्बल अवश्य हो चुकी थी।

तृतीय आंग्ल मराठा युद्ध (1817 – 1819)

तृतीय आंग्ल मराठा युद्ध
तृतीय आंग्ल मराठा युद्ध
  • आंग्ल मराठा युद्ध द्वितीय आंग्ल मराठा युद्ध के बाद मराठों ने फिर से अपनी शक्ति को सुदृढ़ करने का प्रयास किया जिसे उन्होंने आपसी लड़ाई में खो दी थी। इस समय बंगाल का गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स था। हेस्टिंग्स ने पिंडलियों के दमन का एक अभियान चलाया और इसी दौरान उसने पेशवा, सिंधिया तथा भोंसले को अपमानजनक संधियां करने पर बाध्य किया। विवश होकर इन तीनों ने फिर से अंग्रेजो के खिलाफ संघर्ष की शुरुआत कर दी। इस संघर्ष में अंग्रेजों ने पेशवा को किर्की, भोंसले को सीताबर्डी तथा होल्कर को महिदपुर नामक स्थान पर परास्त किया। इस प्रकार अंग्रेजों ने मराठों की शक्ति को अंतिम रूप से समाप्त कर दिया। पुणे को अंग्रेजों ने अपने अधिकार में ले लिया तथा अन्य मराठा राज्यों जैसे सिंधिया, होल्कर, भोंसले और गायकवाड़ की राजनीतिक और सैनिक शक्ति में कटौती करके उन्हें अंग्रेजों के अधीन शासन करने का अधिकार दिया।

मराठों के पतन का कारण

योग्य मराठा शासकों का अभाव

पेशवा में माधवराव प्रथम सिंधिया में महादजी सिंधिया तथा होल्कर में अहिल्याबाई होलकर और तुकोजी होलकर के बाद योग्य एवं दूरदर्शी शासकों का अभाव रहा।

आपसी संघर्ष

पेशवा माधवराव प्रथम के मृत्यु के पश्चात पेशवा पद के उत्तराधिकार के लिए अत्यधिक षडयंत्र एवं संघर्ष का दौर रहा। रघुनाथ राव के द्वारा पेशवा पद की प्राप्ति के लिए अंग्रेजों के साथ सूरत और पुरंदर जैसी संध्या की गई, जो मराठों की शक्ति को कम करती गई।

मराठा साम्राज्य में एकता का अभाव

मराठा साम्राज्य कई क्षेत्रों में विभाजित था जैसे नागपुर में भोंसले, इंदौर में होल्कर, बड़ौदा में गायकवाड़, ग्वालियर में सिंधिया और पुणे में पेशवा। इन सारी शक्तियों में सर्वथा एकता का अभाव रहा तथा पेशवा पद की प्राप्ति के लिए आपस में ही लड़ते रहे।

सुशासन का अभाव

मराठा शासकों ने कभी सुशासन पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। मराठा शासकों ने लोगों की खुशी, सुरक्षा और प्रगति के लिए कोई भी विशेष प्रयत्न नहीं किया। इसके विपरीत अपनी आय का प्रमुख साधन लूटमार, चौथ और सरदेशमुखी को बना रखा था जबकि महाराष्ट्र की बंजर भूमि कृषि के लिए उपयुक्त नहीं थी, अतः वहां की जनता ऐसे करों को देने में सक्षम नहीं थी।

आत्मनिर्भरता का अभाव

बाद के मराठा शासकों मैं आत्मनिर्भरता का अभाव था। ये शासक हमेशा अपनी सुरक्षा के लिए दूसरे राष्ट्रों पर निर्भर रहते थे। ये मुख्यतः फ्रांसीसियों पर निर्भर रहते थे जो समय आने पर कभी सहायता नहीं कर पाते थे।

सुव्यवस्थित सैन्य व्यवस्था का अभाव

मराठों की सैन्य व्यवस्था तथा युद्ध नीति काफी प्राचीन हो चुकी थी। अब उन्हें नई तकनीकी पर आधारित सैन्य व्यवस्था एवं युद्ध नीति की आवश्यकता थी परंतु उन्होंने इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। फलस्वरूप अंग्रेजों के उच्च कोटि की सैन्य संगठन के सामने टिक नहीं पाई।

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