अधीनस्थ न्यायालय

अधीनस्थ न्यायालय

अधीनस्थ न्यायालय
  • प्रत्येक राज्य की अपनी एक न्यायपालिका होती है जिसमें एक उच्च न्यायालय और उसके अधीन कार्य करने वाले कई निम्न न्यायालय होते हैं, इन्हीं निम्न न्यायालयों को अधीनस्थ न्यायालय कहा जाता है।ये न्यायालय जिला एवं निम्न स्तरों पर कार्य करती है।
  • इसका वर्णन संविधान के भाग 6 में अनुच्छेद 233 से 237 के अंतर्गत किया गया है।

अधीनस्थ न्यायालयों की संरचना एवं कार्य

  • राज्यों में उच्च न्यायालय के अधीन आने वाले निम्न न्यायालयों को अधीनस्थ न्यायालय कहा जाता है अधीनस्थ न्यायालयों की प्रकृति हर राज्य में भिन्न-भिन्न हो सकती है।
  •  सामान्यतः इनकी प्रकृति कुछ इस प्रकार होती है :- सामान्यत: उच्च न्यायालय के ठीक नीचे जिला न्यायालय या सत्र न्यायालय होते हैं। दरअसल यह दोनों नाम एक ही न्यायालय के हैं सिर्फ इनके कार्यों के आधार पर अलग-अलग नामों से जाना जाता है।
  • अतः जिला न्यायाधीश या सत्र न्यायाधीश एक ही होते हैं, सिर्फ इनके कार्यों के आधार पर इन्हें अलग-अलग नामों से जाना जाता है।

जिला न्यायालय

  • किसी भी तरह के दीवानी मामले जिला न्यायालय के अंतर्गत आते हैं तथा इसकी सुनवाई करने वाले न्यायधीश को जिला न्यायाधीश कहा जाता है।
  • जिला न्यायाधीश जिले का सबसे बड़ा न्यायिक अधिकारी होता है।
  1. जिला न्यायाधीश के पास प्रशासनिक एवं न्यायिक शक्तियां होती है।
  2. जिला न्यायाधीश दीवानी, सिविल और अपराधिक मामलों की सुनवाई कर सकता है।
  3. जिला न्यायाधीश को अन्य सभी अधीनस्थ न्यायालयों का निरीक्षण करने की शक्ति प्राप्त होती है।
  4. जिला न्यायाधीश को उम्र कैद से लेकर मृत्युदंड तक देने का अधिकार होता है। परंतु मृत्युदंड के लिए उच्च न्यायालय का अनुमोदन जरूरी है।

जिला न्यायालय

  • किसी भी तरह के फौजदारी मामले सत्र न्यायालय के अंतर्गत आते हैं तथा इसके सुनवाई करने वाले न्यायाधीश को सत्र न्यायाधीश कहा जाता है।

दीवानी मामला

  • ऐसे मामले जिसमें संपत्ति सम्बन्धी या पद सम्बन्धी अधिकार विवादित हो। कृषि भूमि से सम्बन्धित मामले, मोटर यान या रेल दुर्घटना से संबंधित मामले, या श्रमिकों व उन के नियोजकों के मध्य विवाद, सरकारी कर्मचारियों की सेवा से संबंधित मामले आदि सभी मामले दीवानी मामले के अंतर्गत आते हैं।

फौजदारी या अपराधिक मामला

  • भारत में भारतीय दंड संहिता तथा अन्य बहुत से कानूनों के द्वारा कुछ कृत्यों और कुछ अकृत्यों को दंडनीय अपराध घोषित किया गया है। ऐसे सभी मामले जिन में किसी व्यक्ति को कोई अपराध करने के लिए दंड दिए जाने हेतु विचार किया जाए वे सभी मामले अपराधिक या फौजदारी मामले कहे जाते हैं। उदाहरण के तौर पर यदि कोई व्यक्ति उपभोक्ता कानून या अधिनियम का पालन नहीं करता है तो यह मामला एक फौजदारी या अपराधिक या दांडिक मामला कहलाएगा।
  • जिला एवं सत्र न्यायालय के ठीक नीचे दीवानी मामलों के लिए अधीनस्थ न्यायाधीश का न्यायालय तथा फौजदारी मामलों के लिए मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी का न्यायालय होता है। मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी अधिकतम 7 वर्ष कारावास की सजा दे सकता है।
  • सबसे निचले स्तर पर दीवानी मामलों के लिए मुंसिफ न्यायाधीश का न्यायालय तथा फौजदारी मामलों के लिए न्यायिक दंडाधिकारी का न्यायालय होता है। न्यायिक दंडाधिकारी अधिकतम 3 वर्ष के कारावास की सजा दे सकता है।

पंचायत न्यायालय

  • कुछ राज्यों में निम्न स्तर पर छोटे दीवानी एवं फौजदारी मामलों की सुनवाई करने के लिए पंचायत न्यायालयों की व्यवस्था होती है।

जिला न्यायाधीश की नियुक्ति 

  • जिला न्यायाधीश की नियुक्ति राज्यपाल उच्च न्यायालय के परामर्श निम्नलिखित योग्यता के आधार पर करता है:-
  1. कम से कम 7 वर्ष अधिवक्ता रहा हो।
  2. उच्च न्यायालय ने उसकी सिफारिश की हो।
  3. वह केंद्र या राज्य सरकार में किसी सरकारी सेवा में न हो।

अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति

  • इनकी नियुक्ति भी राज्यपाल ही करता है परंतु उच्च न्यायालय और राज्य लोक सेवा आयोग के परामर्श से।

लोक अदालत

  • लोक अदालत का अर्थ जनता का अदालत या न्यायालय है, यह गांधीवादी दर्शन पर आधारित है।
  • लोक अदालत एक ऐसा मंच है जहां उन सभी मामलों को जो या तो न्यायालय में लंबित हैं या अभी मुकदमे के रूप में दाखिल नहीं हुए हैं, को सौहार्दपूर्ण ढंग से बातचीत, मध्यस्थता एवं मान मनौव्वल के जरिए विशेष रूप से प्रशिक्षित एवं अनुभवी विधि अभ्यासियों द्वारा निपटाया जाता है।

लोक अदालत के लाभ एवं विशेषता

  • लोक अदालत त्वरित तथा कम खर्चीला न्याय का विकल्प है।
  • इसकी कार्यवाही में न कोई विजयी और न कोई पराजित होता है अतः दोनों पक्षों के बीच द्वेष की भावना नहीं आती।
  • यहां सभी पक्ष अपने वकीलों के माध्यम से न्यायाधीश से सीधे संवाद कर सकते हैं।
  • इसका निर्णय सिविल कोर्ट के निर्णय के बराबर होता है।
  • इसका न्याय निर्णय गैर अपीलीय होता है जिससे अंतिम समाधान में विलंब नहीं होता।

स्थाई लोक अदालत

  • स्थाई लोक अदालत लोक अदालत का ही स्थाई रूप है। दरअसल लोक अदालतों की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए इसकी सुरक्षा तथा इसके द्वारा पारित फैसलों को वैधानिकता प्रदान करने की मांग उठने लगी थी। अता लोक अदालत को वैधानिक दर्जा प्रदान करने के लिए ‘कानूनी सेवा प्राधिकरण अधिनियम,1987’ पारित किया गया।
  • बाद में 2012 में इस अधिनियम में संशोधन करके लोक अदालत को स्थाई बना दिया गया।

परिवार न्यायालय

  • पारिवारिक मामलों से संबंधित विवादों को सौहार्दपूर्ण तरीके से बातचीत एवं मध्यस्थता के जरिए त्वरित निपटारा करने के लिए ‘परिवार न्यायालय अधिनियम, 1984’ पारित किया गया और इस प्रकार परिवार न्यायालय अस्तित्व में आया।

ग्राम न्यायालय

  • ग्रामीण लोग कई कारणों (सामाजिक, आर्थिक एवं अन्य कारण) से न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित रह जाते थे। अतः एक ऐसे न्यायालय बनाने की आवश्यकता थी जो ग्रामीण जनता के पहुंच में हो, कम खर्चीला हो और त्वरित न्याय सुलभ हो करवा सके। अतः इसके लिए ‘ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008’ पारित किया गया और इस प्रकार ग्राम न्यायालय की स्थापना हुई।

राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (NLSA)

  • समाज के कमजोर वर्ग अक्सर कानूनी न्याय से वंचित रह जाते थे, जबकि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 39a समाज के कमजोर वर्गों के लिए निशुल्क कानूनी सहायता का प्रावधान करता है वही अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की बात करता है। अतः कानूनी सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 के तहत राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण का गठन किया गया जिसका उद्देश्य कमजोर वर्गों तक निशुल्क कानूनी सहायता पहुंचाना है।
  • इसके निम्नलिखित कार्य हैं:-
  1. विवादों को सौहार्दपूर्ण ढंग से निपटारे के लिए लोक अदालतों का आयोजन करना।
  2. अर्ह व्यक्तियों को मुफ्त में एवं सक्षम कानूनी सेवाएं उपलब्ध कराना।
  3. ग्रामीण क्षेत्रों में कानूनी जागरूकता शिविरों का आयोजन करना।

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