अंग्रेजों का मुगलों पर विजय

अंग्रेजों का मुगलों पर विजय

अंग्रेजों का मुगलों पर विजय
अंग्रेजों का मुगलों पर विजय

अंग्रेजों का मुगलों पर विजय अंग्रेजों के भारत आगमन के पश्चात एक तरफ तो अंग्रेजों ने भारत आए अन्य यूरोपीय व्यापारिक शक्तियों को परास्त किया तथा दूसरी तरफ उन्होंने भारत के स्थानीय शासकों से जमकर संघर्ष किया। पिछले अध्याय ‘भारत में यूरोपियों का आगमन’ मे हमने भारत आने वाले सभी यूरोपीय व्यापारिक शक्तियों के बारे में पढ़ा, अंग्रेजों के साथ उनके संघर्ष को भी देखा तथा यह भी जाना की अंग्रेजों ने उन्हें परास्त करके कैसे भारत में अपना व्यापारिक एकाधिकार स्थापित किया।
इस अध्याय में हम यह जानने और समझने का प्रयास करेंगे की भारत में अंग्रेज भारतीय स्थानीय शासकों से कैसे संघर्ष किया तथा कैसे उन्हें परास्त करके भारत में अंग्रेजी शासन स्थापित करने में सफल हुए।

मुगलों का पतन

  • अंग्रेजों का मुगलों पर विजय अंग्रेजों के भारत आगमन के पश्चात सूरत में कोठी स्थापित करने के उद्देश्य से पहली बार 1609 ईस्वी में कैप्टन विलियम हॉकिंस मुगल सम्राट जहांगीर के दरबार में पहुंचे परंतु पुर्तगालियों के षड्यंत्र के कारण इस समय अंग्रेजों की यह मांग पूरी नहीं हो पाई परंतु 1611 ईस्वी में मुगल सम्राट जहांगीर ने अंग्रेजों को सूरत में कोठी स्थापित करने की अनुमति दे दी।
  • 1615 ईस्वी में सर थॉमस रो मुगल सम्राट जहांगीर के दरबार में पहुंचा और उसने विभिन्न क्षेत्रों में कारखाने स्थापित करने के लिए सम्राट से विभिन्न विशेषाधिकार प्राप्त किया।
  • अंग्रेज इसी तरह समय के साथ भारत में अपने कारखानों की संख्या बढ़ाते चले गए।
  • 1651, 1656 और 1672 में मुगल शासकों द्वारा कई फरमान जारी किए गए जिनके माध्यम से अंग्रेजों को कई तरह की चुंगी और सीमा शुल्कों से मुक्ति मिली।
  • 1680 ईस्वी में मुगल सम्राट ने कंपनी पर जजिया कर लगाया और इसके बदले में कंपनी को सूरत के अलावा सभी जगह सीमा शुल्क रहित व्यापार करने की अनुमति दे दी। इससे अंग्रेजों की व्यापारिक एवं आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होने लगी।
  • 1691 ईस्वी में औरंगजेब ने एक फरमान जारी किया जिसके तहत उसने अंग्रेजों को एक निश्चित वार्षिक राशि के बदले बंगाल में चुंगी रहित व्यापार करने की अनुमति दे दी।
  • 1707 ईस्वी में औरंगजेब की मृत्यु हो गई जो मुगलो में अंतिम शक्तिशाली शासक माना जाता है। औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात मुगल शासकों में कोई ऐसा शासक आया ही नहीं जो मुगलों द्वारा स्थापित इतने बड़े साम्राज्य को कुशलता पूर्वक चला सके। अतः अंग्रेजों ने इसका भरपूर फायदा उठाया।
  • 1717 ईस्वी में मुगल सम्राट फर्रूखसियर ने ‘शाही फरमान’ जारी किया जिसने अंग्रेजो को निम्नलिखित विशेषाधिकार दे दिए –
  1. ईस्ट इंडिया कंपनी को कोलकाता के आस पास के और अधिक क्षेत्रों में राजस्व वसूली के अधिकार प्रदान किए गए।
  2. 10000 सालाना राशि देने के एवज में सूरत के सभी करों से उन्हें मुक्ति मिल गई।
  3. 30000 सालाना राशि देने के एवज में कंपनी को बिना शुल्क दिए बंगाल में मुक्त रूप से व्यापार करने की छूट मिली।
  4. मुंबई में ढाले गए कंपनी के सिक्के को पूरे मुगल साम्राज्य में वैधता प्रदान करने की भी घोषणा की गई।
  • 1757 ईस्वी में रॉबर्ट क्लाइव (अंग्रेज) और बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के बीच प्लासी का युद्ध हुआ जिसमें अंग्रेज विजयी हुए इसके पश्चात बंगाल में अंग्रेजों का प्रभुत्व जम गया।
  • 1764 ईस्वी में हेक्टर मुनरो (अंग्रेज) और बंगाल के नवाब मीर कासिम, अवध के नवाब सुजाउद्दौला और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय के बीच बक्सर का युद्ध हुआ जिसमें अंग्रेज विजयी रहे।
  • उपरोक्त दोनों युद्धों प्लासी का युद्ध और बक्सर के युद्ध के पश्चात मुगलों का पतन होता ही चला गया और अंग्रेजों की स्थिति मजबूत होती चली गई।

मुगलों के पतन का कारण

  • अंग्रेजों का मुगलों पर विजय मुगलों द्वारा अंग्रेजों को शुरुआत में ही कर संबंधी कई रियायतें एवं व्यापारिक छूट देना साथ ही साथ विभिन्न स्थानों पर कारखाने स्थापित करने के विशेषाधिकार देना।
  • मुगल सम्राट औरंगजेब द्वारा लागू किए गए गलत नीतियों ने भी मुगल साम्राज्य को कमजोर किया।
  • 1707 ईस्वी में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात मुगल साम्राज्य में योग्य उत्तराधिकारी का अभाव।
  • औरंगजेब के पश्चात मुगल साम्राज्य में उत्तराधिकार की लड़ाई।
  • मुगल सम्राट मुहम्मद शाह के शासनकाल में अवध हैदराबाद बंगाल तथा कर्नाटक राज्यों ने स्वतंत्र राज्य/उत्तराधिकारी राज्य का स्थापना कर लिया।
  • इसके पश्चात मुगलों से स्वतंत्र होने वाले कई राज्य सामने आए जैसे –
  1. उत्तराधिकारी राज्य – जो मुगल साम्राज्य के प्रत्यक्ष नियंत्रण से छूट गए (जैसे – अवध, बंगाल, हैदराबाद)
  2. स्वतंत्र राज्य – जो प्रमुख रूप से मुगल साम्राज्य का प्रांतों पर नियंत्रण में कमी के कारण सामने आए (जैसे – मैसूर, केरल, राजपूत राज्य)
  3. मुगलों के विरुद्ध विद्रोहियों द्वारा स्थापित ने राज्य (जैसे – मराठा राज्य, पंजाब राज्य, जाट राज्य)
  • ईरान के नेपोलियन कहे जाने वाले नादिर शाह और अहमद शाह अब्दाली के लगातार आक्रमण ने भी मुगल साम्राज्य को कमजोर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • मराठा, सिख एवं जाट जैसे कई अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के साथ लगातार युद्ध ने मुगलों को आर्थिक रूप से कमजोर कर दिया था।
  • आर्थिक संकट से निपटने के लिए औरंगजेब द्वारा राजस्व बढ़ाए जाने का जमींदारों ने जमकर फायदा उठाया और किसानों एवं अमीरों को जमकर लूटा इससे किसान एवं अमीर दोनों मुगल साम्राज्य के विरुद्ध हो गए।
  • औरंगजेब की धार्मिक नीति ने मराठों, सिखों, जाटों और राजपूतों को नाराज कर दिया जिससे अंततः विद्रोह उत्पन्न हुआ।

इलाहाबाद की संधि

इलाहाबाद की संधि
इलाहाबाद की संधि

बंगाल मुगल शासन के अधीन एक सूबा हुआ करता था। मुगल सम्राट मुहम्मदशाह के शासनकाल के दौरान जब बहुत सारे राज्य स्वतंत्र हो रहे थे, उसी समय मुर्शीदकुली खान (1713 से 1727) ने स्वतंत्र बंगाल की स्थापना की। मुर्शीदकुली खान ने बंगाल में इजारेदारी एवं तबाकी ऋण जैसी प्रथाएं लागू की तथा इसकी राजधानी ढाका से मुर्शिदाबाद स्थानांतरित कर दी।
मुर्शीदकुली खान के मृत्यु के पश्चात उसका दामाद सुजाउद्दीन (1727 से 1739) गद्दी पर बैठा। शुजाउद्दीन के पश्चात मुर्शीदकुली खान का अयोग्य पुत्र सरफराज खान (1739 से 1740) गद्दी पर बैठा। 1740 के गिरिया के युद्ध में बिहार के सूबेदार अलीवर्दी खान ने सरफराज खान की हत्या कर दी और बंगाल की गद्दी पर बैठा। अलीवर्दी खान एक समर्थ और सबल शासक था। इसने मुगलों को राजस्व देना बंद कर दिया। इसके शासनकाल में बंगाल की इस हद तक समृद्धि हुई कि बंगाल को भारत का स्वर्ग कहा जाता था। 18 वीं शताब्दी के प्रारंभिक काल में ब्रिटेन को एशिया से होने वाले आयात का 60% सामान बंगाल से ही जाता था। बंगाल की इस समृद्धि के तरफ अंग्रेजों का आकर्षित होना स्वाभाविक था। अलीवर्दी खान के मृत्यु के पश्चात बंगाल का नवाब अलीवर्दी खान का दामाद सिराजुद्दौला (1756 से 1757) बना। अंग्रेजी कंपनी को विशेषाधिकार देने की वजह से कंपनी ने कलकत्ते की किलेबंदी कर दी थी तथा बंगाल की संप्रभुता के विरुद्ध भारतीय वस्तुओं पर भारी राजस्व वसूल रहे थे, जिससे बंगाल प्रांत का प्रशासन बेहद नाराज था क्योंकि इससे प्रांतीय राजकोष को बड़ी हानि उठानी पड़ रही थी। अतः सिराजुद्दौला ने 20 जून 1756 ईस्वी को फोर्ट विलियम पर कब्जा कर लिया तथा 146 अंग्रेजों को पकड़ कर इस किले की एक छोटी-सी कोठरी में बंद कर दिया, जिसमें से दूसरे दिन सिर्फ 20 लोग ही जीवित बच पाए थे। इसे ही काल कोठरी की त्रासदी या ब्लैक होल ट्रेजेडी कहते हैं। इस घटना के लेखक तात्कालिक ब्रिटिश गवर्नर जेड.हॉलवेल थे।
अंग्रेजों ने जनवरी 1757 में फिर से कलकाता पर आक्रमण किया और अधिकार कर लिया साथ ही साथ मार्च 1757 में चंद्रनगर पर भी आक्रमण कर उस पर भी अधिकार कर लिया। सिराजुद्दौला अल्पव्यस्क होने के कारण इन परिस्थितियों से अच्छी तरह निपट नहीं सका और उसने अंग्रेजों से अलीनगर की संधि कर ली। इस संधि के तहत ईस्ट इंडिया कंपनी को मुगल बादशाह के फरमान के अनुसार व्यापार की सुविधा सुविधाएं फिर से दे दी गई, कलकाता पर अधिकार करने में अंग्रेजों की जो क्षति हुई उसका हर्जाना नवाब को देना पड़ा, अंग्रेजों को कलकाता में सिक्के डालने का अधिकार दिया गया तथा दोनों पक्षों ने भविष्य में शांति बनाए रखने का वादा किया।
परंतु अलीनगर की संधि के पश्चात अंग्रेजों ने चंद्रनगर पर आक्रमण करके उसे अपने कब्जे में ले लिया। अतः 23 जून 1757 ईस्वी को बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला की सेना और रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना के बीच युद्ध हुआ। हालांकि सिराजुद्दौला की सेना अंग्रेजों की सेना से बहुत विशाल थी परंतु सिराजुद्दौला के सेनापति मीर जाफर के षड्यंत्र के कारण सिराजुद्दौला इस युद्ध में पराजित हुआ तथा उसे युद्ध क्षेत्र से भागना पड़ा। भागकर पहले वह मुर्शिदाबाद पहुंचा फिर वहां से अपनी पत्नी के साथ पटना भाग गया। कुछ समय के पश्चात मीर जाफर के पुत्र ने सिराजुद्दोला की हत्या कर दी। इस प्रकार अंग्रेजों ने षड्यंत्र से बंगाल को जीत लिया।
प्लासी के युद्ध के बाद अंग्रेजों ने मीर जाफर को बंगाल का नवाब बना दिया। इसके बदले में मीर जाफर ने अंग्रेजों को बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा में मुक्त व्यापार करने की अनुमति दे दी साथ ही साथ कलकता के पास 24 परगना की जमींदारी भी अंग्रेजों को दे दी तथा ब्रिटिश व्यापारियों एवं अधिकारियों को निजी व्यापार में कर से मुक्ति दे दी। इसके अतिरिक्त उसने अंग्रेजों को 1750000 रुपए युद्ध के हर्जाने के रूप में दिया। इससे अंग्रेजों की समृद्धि एवं ताकत और बढ़ने लगी। कुछ ही समय के पश्चात मीर जाफर एवं उसके दामाद मीर कासिम के बीच संघर्ष शुरू हो गया। इस समय बंगाल के गवर्नर वंशीटार्ट थे, उसने मीर कासिम का पक्ष लिया और उसे बंगाल का नवाब बना दिया। मीर कासिम एक समझदार शासक था, गद्दी पर बैठने के पश्चात उसने अपने अंदर समझदार नौकरशाही का पुनर्गठन किया तथा सेना के कौशल और क्षमता को बढ़ाने के लिए उसमें सुधार किया। उसने अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से मुंगेर स्थानांतरित कर दी तथा कुछ समय के पश्चात उसने अंग्रेजों के व्यापार के लिए 9% कर निश्चित किया परंतु अंग्रेजों ने इसे नकार दिया तब कासिम ने सारे भारतीय व्यापारियों को भी कर से मुक्ति दे दी। इसे अंग्रेजों ने अपना अपमान समझा और मीर कासिम पर धावा बोल दिया मीर कासिम पराजित होने के पश्चात वहां से भाग गया और अवध के नवाब सुजाउद्दौला और शरणार्थी मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय के साथ मिलकर एक संघ बनाया। अक्टूबर 1764 इस्वी को इन तीनों शक्तियों और अंग्रेजो के बीच बक्सर में एक भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें अंग्रेज विजयी हुए। बक्सर का युद्ध जीतने के बाद रॉबर्ट क्लाइव को दूसरी बार बंगाल का गवर्नर बनाया गया। गवर्नर बनने के पश्चात क्लाइव ने 1765 ईस्वी में इलाहाबाद में दो संध्या की – एक मुगल शासक शाह आलम द्वितीय के साथ और दूसरी अवध के नवाब के साथ।
इलाहाबाद की संधि में अवध के नवाब के साथ इस बात पर सहमति हुई की नवाब कंपनी को ₹50 लाख युद्ध के हर्जाना के रूप में देंगे और अंग्रेज इसके बदले उनकी सीमाओं का रक्षा करेंगे और जरूरत पड़ने पर सैनिक सहायता भी देंगे।
शाह आलम द्वितीय के साथ इस बात पर सहमति हुई कि शाह आलम कंपनी को बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा की दीवानी प्रदान करेंगे और इसके बदले कंपनी उन्हें 26 लाख रुपए वार्षिक भुगतान करेंगे।
इस प्रकार अंग्रेजों को दीवानी अधिकार के साथ-साथ बंगाल के राजस्व या वित्तीय प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त हो गया।


इलाहाबाद की संधि

इलाहाबाद की संधि
इलाहाबाद की संधि

इलाहाबाद की संधि के अतिरिक्त रॉबर्ट क्लाइव ने 1765 ईसवी में ही बंगाल में द्वैध शासन की स्थापना की, जिसके अनुसार बंगाल में राजस्व या कर वसूलने का अधिकार कंपनी को मिला तथा प्रशासन करने का अधिकार नवाब को दिया गया। हालांकि क्लाइव के इस प्रयोग के परिणाम अच्छे नहीं निकले। अतः 1772 ईस्वी में वारेन हेस्टिंग ने द्वैध शासन को समाप्त कर दिया। 1773 में वारेन हेस्टिंग को बंगाल का गवर्नर जनरल बनाया गया और यहीं से कंपनी ने भारत में अपने साम्राज्य विस्तार की प्रक्रिया शुरू कर दी।

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